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हिंदी साहित्य में शायद हिंदुस्तान में पहिली बार ये प्रयोग किया जा रहा है।  विज्ञान, आनेवाला प्रौद्योगिकी भविष्य और मनुष्य जीवन को खूबी से कविताओं द्वारा पेश किया है। एकदम सरल भाषा में लिखी हुई ये कविताएँ पढकर आपको अवश्य ये महसूस होगा की हम कितने भयानक भविष्य की ओर रहें हैं।

मसकत, ओमान स्थित भारतीय कवी संतोष कदम ने पिछले कई वर्षों से इस साय फाय कविताओंके फॉर्मेट पर काम किया है और जो पेश किया है वो सचमुच विचार करने को मजबूर कर देता है।  उन्होंने कुछ रचनात्मक संकल्पनाएँ प्रस्तुत की है जो भविष्य में जरूर सच हो सकती है।

शिक्षा से इंजिनीअर और पेशे से मैनेजर होने की वजह से शायद उन्होंने समाज को ३६० डिग्री में यूँ महसूस किया उनकी कविताओं में समाज का हर अंग झलकता है।  टेक्नोलॉजी को छूकर भी वो समाज लेकिन अपना रंग नहीं बदलता। अमीर गरीब का अंतर , सरकार की नीतियाँ , चुनाव , आदि चीज़ों को भविष्य  के समाज में खूबी से बुना है।

हर वर्ग के , हर उम्र के पाठकों को ये नया प्रयोग अनूठा लगेगा।  कविता तो जीवन के हर कण और हर क्षण में शामिल है; उसे कवी तलाशता है कविता कवी को तलाशती है; पता नहीं।


कुछ चुनिंदा कवितायें आपके लिए -


 १)

पृथ्वी से इंसान हटाओ ,
सूर्यमाला से ग्रह हटाओ ,
आकाशगंगा से सूर्यमाला हटाओ ,
और स्पेस से आकाशगंगा हटाओ
बचेकूचे प्लैनेट्स, कॉमेट्स भी
एक झाड़ू लेकर साफ़ कर दो ,
ब्लैक होल को भी एक बार
फ्लश कर दो।
देखो
अब तो कई खुदा दिखता है क्या ?


२)

सूना है -
और किसी सैय्यारे पर ना हवा है ,
ना कोई फ़िज़ा है।
हम किसे पुकारे तो
पास खड़ा शख्स भी
कुछ सुन नहीं सकता
आवाजों के पाँव नहीं है वहाँ ...
हाल तो हमारे सैय्यारे का भी
कुछ ख़ास जुदा नहीं है
काफी तेज हवा है - फिजां है
पर आवाज़ें यहां भी कोई नहीं सुनता
शोर इतना है यहां की
कभी कभी खुद की आवाज़ भी सुनाई नहीं देती
कोई गर दिल की बात कहना चाहे
या कोई सुनना चाहे
तो जाए तो किस प्लेनेट पे जाये ?


***

© Santosh Kadam
Muscat, Oman


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पुस्तक : भावावेग
लेखक : कुन्दन कुमार
मूल्य : 160 रूपये
बाईडिंग : पैपरबैक
पृष्ठ : 120 पेज
प्रकाशक : प्राची डिजिटल पब्लिकेशन

युवा कवि कुन्दन कुमार जी का सारगर्भित काब्य-संग्रह 'भावावेग ' में संकलित मनहर कविताएं पठनीय एवं अनुकरणीय हैं। बेशक कुन्दन जी की कविताओं को समझने के लिए समझ चाहिए। तत्सम शब्दों से सुसज्जित आपकी भाषा उच्चस्तरीय एवं भाव उदात्तवादी है। इस काब्य - संग्रह में कुल 35 कविताये हैं। 'उम्मीद' नामक कविता में आप अपने आशावादी विचार को अभिब्यक्त करते हैं।

लड़खड़ाते जा रहा हूँ मैं कहां
उम्मीद है फिर भी चलूँगा जिस जहाँ
स्वागत मेरा  होगा वहां उस रूप में
जिस रूप को वर्षों भुला आया यहां

कवि कुन्दन की कविताओं में भावों का वेग है । राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का कथन है -

केवल  मनोरंजन न कवि का अर्थ होना चाहिए
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए

आपकी कविता 'भावोन्मुक्त' में उपदेशात्मक ज्ञान की वर्षा होती है -

दया भाव दिखलाओ कुछ, सिखलाओ कुछ हम जड़ लोगों को
हो विद्वान यदि विद्वता दिखाओ, झुठलाओ न यूँ कथनों को
*                *              *                            *
वो दक्ष नहीं होना हमको, जिसे होने में संकोच बढ़े
वो लक्ष्य नहीं ढोना हमको जिसमें भय का संताप उठे

ढाई आखर ('प्रेम') ही मनुष्य जीवन का धर्म है और कर्म है । प्रेम के बिना क्या जीना । 'चित्तवेदना' कविता की प्रत्येक पंक्तियाँ मर्मस्पर्शी हैं –

फेंक खंजर पुष्प का
अब कर वरण जो धर्म है ।
प्रेम का बस सार ही
मनुजीव का एक कर्म है ।

एक ऐसा काब्य - संग्रह जिसमें कल्पना की खुशबू है, बिम्ब  का विधान है, प्रतीकों की छाया है और है फैंटेसी की धूप।  नाम को चरितार्थ करते हुए इस काब्य - संग्रह में सचमुच भावों का आवेग है । 'मेरे पिता' नामक कविता में वातसल्य रस से ओत - प्रोत  भावावेग है -

वर्षों से रात के सन्नाटों में
ढूंढ रहे थे मुझको वो मेरे पिता
*        *          *           *
न जान कमर में, पग भी डगमग  
बढ़े जा रहे फिर भी प्रतिपल

मशहूर पंजाबी कवि अवतार सिंह संधू उर्फ़ पाश ने लिखा है –

"/ सबसे खतरनाक होता है / सपनों का मर जाना /"

इसी भाव को कवि कुन्दन कुमार जी ने अपनी कविता 'स्वप्नसमर' में ब्यक्त किया है -

है अति रंग, है अति उमंग
कर जीवन का न स्वप्न दमन
*        *           *       *
बज्र बना खुद को इतना
पर्वत का बुलंद सीना जितना

वाह ! मानवीकरण अलंकार से अलंकृत कविता 'स्वर्ग धरा'  को पढ़कर तो तपोवन में मन- मयूर झूम उठा । हम  स्वर्ग के लिए अपने मन को यत्र - तत्र - सर्वत्र भटकाते रहते हैं ।  लेकिन स्वर्ग तो धरा ही है -

क्या कमी है रह गयी, जो मिला मुझको नहीं
स्वर्ग जिसका  नाम है, वो धरा तो है यहीं

पर्वतों के उस पार झांकती हुई लालिमा का मनोहारी चित्रण देखिए -

सफेद मोती सी बिखरी हुई ओंस की बुँदे
पर्वतों के उस पार झांकती भोर की लालिमा
इंद्रधनुषी फूलों की घाटियां, है ले रही अंगड़ाईयाँ  
पत्थरों से खेलती उफनती नदी 
है कर रही अटखेलियां

'आकांक्षा', 'भोला ह्रदय', 'दर्द बहुत है', 'विभीषिका', 'छल' और 'शोक' नामक कविताएं हिंदी साहित्य-जगत की कालजयी रचनाएँ हैं।
युवा कवि कुन्दन कुमार जी का इतना सारगर्भित काब्य - संग्रह "भावावेग" प्रकाशित हुआ है। इसके लिए बहुत - बहुत बधाईयां एवं साधुवाद।  अहर्निश लेखनी चलाते रहिए।  अभी तो यह शुरुवात है । मेरी शुभकामनायें आपके साथ है। शुक्रिया


सुनील चौरसिया 'सावन'
प्रवक्ता, केंद्रीय विद्यालय, टेंगा वैली,
अरुणाचल प्रदेश
संपर्क : 9044974084







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पुस्तक समीक्षा "भावावेग" संवेदनाओं के स्वर हैं “भावावेग”


पुस्तक : भावावेग
लेखक : कुन्दन कुमार
मूल्य : 160 रूपये
बाईडिंग : पैपरबैक
पृष्ठ : 120 पेज
प्रकाशक : प्राची डिजिटल पब्लिकेशन


कुन्दन कुमार का नाम साहित्यजगत के लिए अभी अनजाना है। हाल ही में इनका काव्य संग्रह “भावावेग” प्रकाशित हुआ है। जिसमें कवि की उदात्त भावनाओं के स्वर हैं।

मेरे पास समीक्षा की कतार में बहुत सारी कृतियाँ लम्बित थीं। अतः इस कृति की समीक्षा में विलम्ब हो गया। मैंने जैसे ही “भावावेग” को संगोपांग पढ़ा तो मेरी अंगुलियाँ कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर शब्द उगलने लगीं।

एक सौ बीस पृष्ठ के काव्य संग्रह “भावावेग” में 35 विविधवर्णी रचनाएँ हैं। जिसका मूल्य 160 रुपये मात्र है। जिसे “प्राची डिजिटल पब्लिकेशन” मेरठ, उत्तर प्रदेश से प्रकाशित किया गया है।

इस कृति की भूमिका साहित्य सुधा के सम्पादक डॉ. अनिल चड्ढा ने लिखी है। जिसमें उन्होंने लिखा है-
“...सृजन किसी भी नियम या विधा के बन्धन में नहीं है। “कुछ भी कहो, कैसे भी   कहो, साहित्य तो साहित्य ही है” आप अपनी संवेदनाओं को पृष्ठ पर किसी भी रूप में उकेरेंगे तो वह साहित्य बन जायेगा। और फिर इसे कोई लय देंगे तो वह कविता का रूप धारण कर लेगा।“
मेरे विचार से साहित्य की दो विधाएँ हैं गद्य और पद्य जो साहित्यकार की देन होती हैं और वह समाज को दिशा प्रदान करती हैं, जीने का मकसद बताती हैं। साहित्यकारों ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज को कुछ न कुछ प्रेरणा देने का प्रयास किया है। “भावावेश” भी कविता का एक ऐसा ही प्रयोग है। जो कुन्दन कुमार की कलम से निकला है। इस काव्य संग्रह का शीर्षक ही ऐसा है जो पाठकों को इसे पढ़ने को विवश कर देगा।

कवि कुन्दन कुमार ने “दो शब्द” के अन्तर्गत अपने आत्मकथ्य में लिखा है-
“मैं हमेशा से ही आन्तरिक भावनाओं को प्राथमिकता देता आया हूँ, क्योंकि भावनाएँ मन के उस कोमल कोने से प्रसारित होती हैं जो सदा व्यक्ति के वास्तविक व्यक्तित्व से परिचय में सहायक होता है.......।
प्रेम व त्याग की प्रतिमान कलेवर से यदि साक्षात्कार करना हो तो हमारे समाज में एक जाति है, जिसका नाम स्त्री है। जो समस्त वेदना, प्रताड़ना, दुत्कारना सहती रहती है फिर भी देना नहीं छोड़ती.....।
"खैर! इन्हीं जलती-बुझती निःशब्द चिंगारियों की माला को पिरोते हुए अन्धी गलियों से रौशनी की ओर अग्रसर होने की प्रबल इच्छाओं को शब्दरूपी जाल में बुनने की चेष्टाभर है....।“

मैं कवि के कथ्य को और अधिक स्पष्ट करते हुए यह कहूँगा कि “भावावेग” काव्यसंग्रह में लेखक ने अपनी उदात्त भावनाओं के माध्यम से जनजीवन और दिनचर्चा से जुड़ी घटनाओं को अपने शब्द दिये हैं।

 “नादानी” शीर्षक से इस संकलन की यह यह रचना देखिए-
“प्यार किया या की दिल्लगी
छोड़ दिया या अपनाए हो
कैसे समझूँ कि ये है क्या
नैन मिले मुड़ जाते हो
खत लिखते हो प्रेम भरा
नाम भी उसमें मेरा जुड़ा
रखके किताबों में चुप छुपके
देखते ही फिर जाते हो”
“भावावेग” का शुभारम्भ कवि ने “भावावेग” कविता से ही किया है-
“उदर का ये गोरापन
उर से इठलाती यौवन
वाणी में मधुमास लिए
नैनों में मधुवास लिए
कर दें सभी सर्वस्व समर्पण”
संकलन की दूसरी रचना को “हीनता”को परिभाषित करते हुए कवि लिखता है-
“वेदना का वेग ही घातक नहीं जग के लिए
क्रोध की अग्नि प्रबल भू-वक्ष जल पीते चले
बंजर धरा मसान का गर रूप लेकर रह गई
मिथ्या गर्व संग निष्प्राण कंठ फिर खोजते वारि फिरे”
समय की विद्रूपता पर “मैं हँसता हूँ” शीर्षक से कवि ने निम्न प्रकार से शब्द दिये हैं-
जब कुछ उद्धृत शब्द देखता हूँ
उमंगे दिल में दबाये देखता हूँ
खामोशी को अपनाये देखता हूँ
लाचारी में लिपटाये देखता हूँ
समेटे झूठी भावनाएँ देखता हूँ
मैं तो हँसता हूँ”
छल शीर्षक से संकलन की एक और रचना को भी देखिए-
“मेरे द्वार आये तुम कौन अतिथि, रूपवान भुज अशनि बल
स्वतेज प्रबल तेरे भाल अचल हैं, दमक रहा ज्यों शशि भूतल
रवि भी नहीं जिसकी उपमा, वो मनुहारी देखूँ अनिमिष
न नैन मेरे बोझिल होते हैं, ज्वार उठे मन में प्रतिपल”
जीवन में जो कुछ घट रहा है उसे कवि “कुन्दन कुमार” ने गम्भीरता से बाखूबी से चित्रित किया है। नयी कविता के सभी पहलुओं को संग-साथ लेकर काव्य शैली में ढालना एक दुष्कर कार्य होता है मगर कवि ने इस कार्य को सम्भव कर दिखाया है। कुल मिलाकर देखा जाये तो इस काव्य संग्रह की सभी कविताएँ बहुत गम्भीरता लिए हुए हैं और पठनीय है।

मुझे आशा ही नहीं अपितु पूरा विश्वास भी है कि “भावावेग” की कविताएँ पाठकों के दिल की गहराइयों तक जाकर अपनी जगह बनायेगी और समीक्षकों की दृष्टि में भी यह उपादेय सिद्ध होगी।

हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-

समीक्षक
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कवि एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा





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पिछले दिनों हमने दिल्ली से कवि एवं शिक्षक डॉ. प्रदीप कुमार सुमनाक्षर से साक्षात्कार किया। अभी हाल ही में आपकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुई है, जिनपर भी हमने उनसे वार्ता की। स्वभाव से मिलनसार, मृदुभाषी एवं सहयोगी प्रवृत्ति के डा‍ॅ. सुमनाक्षर की अब तक दर्जन भर पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के प्रमुख अंश:

indiBooks : प्रदीप जी, हम आपका संक्षिप्त परिचय आपके शब्दों में जानना चाहते है?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : परिचय तो इतना ही है कि जितना अभी आप जानते है, अभी खुद मैं अपने परिचय को खोज रहा हूँ।

indiBooks : आपकी पहली पुस्तक कब प्रकाशित हुई थी? उस के बारे में कुछ बताएं?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : पहली पुस्तक 2016 में प्रकाशित हुई, “स्नेहा”। स्नेहा, प्रेम की कल्पनाओं की उड़ान है, प्रेम का दर्द है, जो पुरे ना हुए उन खवाबों, अभिलाषाओं की टीस है, जो पाठक के दिल में सीधे उतर जाती है।

indiBooks : पिछले दिनों आपकी दो पुस्तकें ‘चन्द्री’ एवं ‘ख्याल’ प्रकाशित हुई है, दोनों पुस्तकों के नाम अपने आप में विशेष हैं, क्या आप इनके बारे में जानकारी देना चाहेंगे? 
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : पुस्तकों के नाम मैं बहुत ही खोज बीन और सोच समझ कर ही रखता हूँ।

“चन्द्री” एक प्रेम कविता है जो चंदरी के प्रति मेरे प्यार के अधूरे खवाबों की दुनिया में विचरती है, जो वास्तविकता है और अधूरी है, हर अधूरी प्रेम कहानी की तरह।

“ख्याल” मेरे मन में प्यार, वफा, दर्द के प्रति उपजी संवेदनाये है जो प्यार के स्वरूप को सहज ही पाठको के मन को छूने की ताकत रखती है।

indiBooks : आपकी अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। क्या आप उनके बारे में हमारे पाठकों को जानकारी देना चाहेंगे?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : मेरी 8–9 पुस्तकें अभी तक प्रकाशित हो चुकी है और एक अभी आने वाली है। मेरी पुस्तकें “स्नेहा”, “तसव्वुर”, “दर्द पराया”, “ख्याल” सब प्रेम की पृष्ट भूमि पर लिखी प्रेम कवितायेँ है जो प्रेम के अनेको बिम्ब प्रस्तुत करती है। “मेरा वतन” देश प्रेम व देश की अनेको समस्याओ की और इशारा करती हुई काव्य संग्रह है! “तारीखें” मेरे जीवन की हर रोज की घटनाओं को दर्शाती हुई चाहते भरी कविताओं का संग्रह है। “पत्तियां” और “पंखुडियां” अपने नाम के अनुसार छोटी छोटी चार चार पंक्तियों की प्रेम रचनाये है, जो पढ़ने वालों को अपने अंदर समां लेती है।

indiBooks : प्रदीप जी, आपकी प्रकाशित पुस्तकों में सबसे ज्यादा पसंदीदा पुस्तक कौन सी है?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : बड़ा कठिन प्रश्न है, लेखक की दृष्टि से हर पुस्तक विशेष है फिर भी मेरा मानना है कि पहली पुस्तक ही किसी लेखक की सबसे पसंदीदा होगी! मेरी पहली पुस्तक “स्नेहा’ ही मुझे आज भी सबसे ज्यादा पसंद है, क्योंकि जो आनंद, ख़ुशी पहली पुस्तक के हाथों में आने पर मिलती है वो फिर कभी उतनी नही मिलती।

indiBooks : आपके मन में पुस्तक प्रकाशन के लिए विचार कब और कैसे आया?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : लिखते तो बहुत पहले से थे, परन्तु बस शौक के लिए लिखा और डायरी में बंद! फिर शादी हो गयी तो पत्नी चुपके-चुपके वो डायरी पढ़ती रहती, फिर एक रोज उसने कहा कि इन्हें छपवाते क्यूँ नहीं, कोई तो पढ़ेगा! बस यही से विचार आया कि चलो अपनी पुरानी दुनिया को फिर जिन्दा कर ले और बन गये कवि।

indiBooks : जब आप पुस्तक के लिए लेखन करते हैं, तो आपको सबसे ज्यादा किसका सहयोग प्राप्त होता है?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : मेरी पत्नी मोनिका का, सबसे पहले उसे ही सुनाता हूँ! वो ही पुस्तक में एडिटिंग का काम देखती है कमी पेशी कुछ रह गयी है तो बताती है!

indiBooks : लेखन के लिए आप कहां से प्रेरणा प्राप्त करते हैं?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : यादों से, प्रकृति से, संगीत से, समाज से!

indiBooks : लेखन के लिए आप समय प्रबंधन कैसे करते हैं?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : जी कोशिश करता हूँ कि रात्रि के कुछ घंटे कविता के लिए बचा कर रखूं!

indiBooks : आप अपने जीवन में किसे अपना आदर्श मानते है और क्यों?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : अपनी अध्यापिका डॉ शशि प्रभा सिंह, दिल्ली विश्विधालय, क्योंकि उन्होंने मेरे जीवन को एक नयी दिशा दी, जो मुझे आज भी राह पर चला रही है।

indiBooks : अब तक प्रकाशकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : अब किसी का नाम लेना उचित नही है। दो प्रकाशकों ने बड़ा रुलाया, एक प्रकाशक ने अभी भी उलझा कर रखा है, हाँ! प्राची डिजिटल पब्लिकेशन की सेवाओं और उनके स्वभाव से मैं बहुत प्रभावित हूँ, उन्होंने कार्य सही समय और गुणवत्ता के साथ कर के दिया।

indiBooks : आपकी पसंद की लेखन विद्या कौन सी है, जिसमें आप सबसे ज्यादा लेखन करते हैं?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : मैं छन्दमुक्त गीत, कवितायेँ और ग़ज़ल ही ज्यादा लिखता हूँ।

indiBooks : क्या आपका कोई Ideal लेखक या लेखिका है? जिनसे आपको प्रेरणा मिलती है। यदि हां, तो आप उनसे प्रेरणा कैसे प्राप्त करते है?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : मुझे आदरणीय नीरज जी की लेखनी, उनका सरल व्यक्तित्व और अंदाज बड़ा प्रभावित करता है। उनकी कई रचनायें मेरे मन में हमेशा चलती रहती है, उन्होंने हिंदी साहित्य के जिस शिखर को छुआ है वो सभी नव लेखकों के लिए आदर्श हैं, उनका लेखन व जीवन संघर्ष और उन्होंने जिस मुकाम को छुआ, वो  मुझे आगे बढ़ने के लिए हमेशा उर्जा प्रदान करते है।

indiBooks : क्या आपको जीवन में ऐसी उपलब्धि प्राप्त हुई है, जिसने आपके परिवार और मित्रों को अपार खुशियों से भर दिया हो?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : आज लेखन के माध्यम से अनेको मंचो पर राष्ट्रीय व अंतर्रराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए और पहचान बनी, अखबार रेडियो आदि में आने का अवसर मिला, विद्यावाचस्पति व विद्या विशारद की मानद उपाधि से समान्नित होने का अवसर प्राप्त हुआ, और अभी यात्रा जारी है।

indiBooks : प्रदीप जी, आपके जीवन में कोई ऐसी प्रेरक घटना घटित हुई है, जिसे आप कभी भूलना नहीं चाहेंगे? लेकिन उसे आप हमारे पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे।
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : कुछ बातें साझा हो ही नही पाती, बस इतना ही कि खुश रहों, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करो।

indiBooks : हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के उत्थान पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : जिस गति से हिंदी का प्रचार और प्रसार निजी स्तर पर हो रहा है उससे लगता है की हिंदी का भविष्य बड़ा उजला है। रोज हिंदी में कितना साहित्य जन्म ले रहा है! मगर मैं हिदी को उर्दू से अलग करने या देखने के पक्ष में नही हूँ। मुझे लगता है की हिंदी उर्दू अब बहनें नही, पति-पत्नी हो गयी है, जिन्हें अलग करना ना तो न्यायोचित है और ना तर्क संगत! ये पाप के सामान है।

indiBooks : आप अपने पाठकों से क्या कहना चाहेंगे?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : नए लेखकों को भी पढ़े, सम्मान दें केवल बड़े लेखकों के नाम को ना पढ़े नव लेखनी को भी आदर दे, क्योंकि मैंने देखा है कि हमारे यहाँ पाठक किताब लेखक के नाम से ज्यादा पढ़ते है, वो दूसरों को पढ़ना ही नही चाहते।

indiBooks : आप नये लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?  
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : अच्छा लिखना चाहते है तो अच्छा पढ़ें, जो विषय मन के सबसे ज्यादा करीब हो उस पर लिखें, हर विषय हर टॉपिक पर लिखने से बचे।





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काव्य संग्रह 'भावावेग' के लेखक कुन्दन जी पुस्तक पिछले दिनों ही प्रकाशित हुई है। जिसे पाठकों द्वारा बहुत ज्यादा पसंद किया गया और उनके लेखन को सराहा। न्यायिक सेवा में सेवारत सरल स्वभाव के कुन्दन जी हमने साक्षात्कार किया। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के प्रमुख अंश:

Indibooks : कुन्दन जी, हम आपका संक्षिप्त परिचय आपके शब्दों में जानना चाहते है?
Kundan Kumar : मेरा जन्म बिहार के मुंगेर जिला अंतर्गत असरगंज नामक कस्बे में दो भाई एवं एक बहन के बाद हुआ। मेरी उच्च विद्यालय तक की शिक्षा असरगंज में, तत्पश्चात मुंगेर जिला अंतरगत ही तारापुर तथा दिल्ली में संपन्न हुई। वर्तमान में मैं जिला व सत्र न्यायलय नौगांव, असम में न्यायिक कर्मचारी के तौर पर कार्यरत हूँ।

Indibooks : ‘भावावेग’ आपका पहला काव्य संग्रह है, इसके बारे में कुछ बताएं। 
Kundan Kumar : 'भावावेग' पुस्तक की समस्त कवितायें किसी न किसी रूप में ब्यक्ति के ब्यक्तित्व को दर्शाती है। इन कविताओं के माध्यम से मैंने लोगों को समझने का प्रयास किया है, उनका दंभ, उनकी बेचैनी, डर, प्रेम, घृणा इत्यादि जो भी ब्यक्तियों की दिनचर्या में आमतौर या खासतौर पर शामिल होते हैं। जिसे कि मैं अपनी भाषा में स्वयं को उस स्थान पर रखकर काब्यरूप देने का प्रयत्न किया है।

Indibooks : पुस्तक प्रकाशन के लिए विचार कैसे बना?
Kundan Kumar : किसी भी रचनाकार की एक ही इच्छा होती है कि उनकी रचनाएँ जन- जन तक पहुंचें, जो पत्रिकाओं के माध्यम से मेरे लिए संभव भी था। परन्तु मैं चाहता था कि सभी रचनाएँ यदि एक साथ पाठकों तक पहुंचती है तो वे मेरे लेखन शैली को और अच्छे से समझकर अपनी प्रतिक्रिया से मेरा ध्यान उन बिंदुओं पर केंद्रित कराने में सक्षम होंगे जो मेरी लेखनशैली को और प्रगाढ़ बनाने में सहायक होगी। इसके लिए कविताओं को संकलित कर पुस्तकरूप प्रदान करना ही एकमात्र तरीका शेष था।

Indibooks : कुन्दन जी, आपकी रचनाएं कई पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होती रहती हैं, आप कैसे समय प्रबंधन करते हैं? 
Kundan Kumar : न्यायिक कर्मचारी होने के कारण कार्यालय का समय निर्धारित है तथा सप्ताहांत में कम से कम एक दिन का तो अवकाश प्राप्त हो ही जाता है, जो लेखन में मेरे लिए काफी मददगार होती है।

Indibooks : ‘भावावेग’ काव्य संग्रह को लिखने के दौरान आपको किसका सबसे ज्यादा सहयोग प्राप्त हुआ? आप चाहें तो यहां पर उनका शुक्रिया कर सकते है? 
Kundan Kumar : 'भावावेग' काब्य संग्रह लिखने के दौरान मेरे मित्रों एवं मेरी बड़ी बहन का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ है। जिन्होंने मेरी रचनाओं को पढ़कर मुझे सदा प्रोत्साहन प्रदान करते रहे हैं। साथ ही मैं साहित्यसुधा का भी ह्रदय से आभार प्रकट करता हूँ जिसने मेरी कविताओं को सदा अपने सम्मानीय पत्रिका में स्थान देकर लेखन के लिए  प्रोत्साहित करती रही।

Indibooks : लेखन के लिए आप कहां से प्रेरणा प्राप्त करते हैं?
Kundan Kumar : व्यक्तियों तथा उनके व्यक्तित्व से मुझे सबसे अधिक प्रेरणा प्राप्त होती है साथ ही मुझे सम्मानीय व्यक्तियों के साक्षात्कार पढ़ने, सुनने तथा देखने में रूचि है, जिनमें उनके मुखारविंद से कुछ ऐसी बातें - विषय की चर्चा हो जाती है जो मेरे लिए प्रेरणा का काम करती है।

Indibooks : पहली पुस्तक प्रकाशित कराने में क्या आपको किसी परेशानी का सामना करना पड़ा? यदि हां तो वो परेशानी क्या रहीं? 
Kundan Kumar : यूँ कहें कि पुस्तक स्वयं ही प्रकाशन के लिए तैयार बैठी थी, इसके लिए मुझे किसी प्रकार का कोई भागदौड़ नहीं करना पड़ा, बस मुझे उसका थोड़ा सा सहयोग करना था। पुस्तक प्रकाशन में मैं अहम् भूमिका अक्षय गौरव पत्रिका का भी समझता हूँ जिन्होंने मेरी कविता को अपने पत्रिका में स्थान दिया तथा मेरा संपर्क प्राची डिजिटल पब्लिकेशन से हो सका। तत्पश्चात प्राची डिजिटल पब्लिकेशन का सहयोग ही इस प्रकार का था कि मेरी रही सही चिंताएं भी स्वतः ही समाप्त हो गयी।

Indibooks : आप अपने जीवन में किसे अपना आदर्श मानते है और क्यों?
Kundan Kumar : अब तक तो कोई भी एक ब्यक्ति मेरे ह्रदय के करीब नहीं पहुँच पाए हैं जिनका कि मैं अपने जीवन में अनुसरण करूं।

Indibooks : अब तक प्रकाशकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?
Kundan Kumar : अत्यंत ही हृदयस्पर्शी। सौभाग्यवश मेरा संपर्क जिन किसी भी प्रकाशकों से हुआ है उन सबों का प्रेम मेरे प्रति छोटे भाई के सामान रहा तथा उन्होंने मेरी रचनाओं को सराहते हुए मेरे ह्रदय में हिंदी साहित्य के लिए सतत समर्पण का भाव उजागर किया है।

Indibooks : आपकी पसंद की लेखन विद्या कौन सी है, जिसमें आप सबसे ज्यादा लेखन करते हैं?
Kundan Kumar : व्यक्तित्व चित्रण व प्रेम।

Indibooks : क्या आपका कोई Ideal लेखक या लेखिका  है? जिनसे आपको प्रेरणा मिलती है। यदि हां, तो आप उनसे प्रेरणा कैसे प्राप्त करते है?
Kundan Kumar : मैं समस्त रचनकारों का आदर करता हूँ। उनकी विभिन्न विधाओं में रची गयी रचनाओं को अधिक से अधिक अध्ययन करना चाहता हूँ तथा यथासंभव करता भी हूँ, जिनसे मुझे लेखनशैली सुदृढ़ व स्पष्ट करने का मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

Indibooks : कुन्दन जी, क्या आपको जीवन में ऐसी उपलब्धि प्राप्त हुई है, जिसने आपके परिवार और मित्रों को अपार खुशियों से भर दिया हो।
Kundan Kumar : इसके लिए मैं प्रयासरत हूँ।

Indibooks : आपके जीवन में कोई ऐसी प्रेरक घटना घटित हुई है, जिसे आप कभी भूलना नहीं चाहेंगे? लेकिन उसे आप हमारे पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे।
Kundan Kumar : इस प्रकार की कोई घटना तो मुझे स्मरण नहीं है जो मेरे जीवन को किसी प्रेरणा से सराबोर कर दिया हो।

Indibooks : हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के उत्थान पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
Kundan Kumar : हिंदी को अभी बहुत लम्बी दुरी तय करनी है। जब तक वे लोग जो यह कहकर स्वयं को गौरवान्वित करते रहेंगे कि ‘मुझे हिंदी अच्छे से नहीं आती’ तथा हिन्दीभाषी जबतक स्वयं को हीनता की दृष्टि से देखेंगे तबतक हिंदी का कल्याण संभव नहीं है। आज हिंदी भारत के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित होकर रह गयी है तथा अहिन्दी भाषी क्षेत्र के लोग हिंदीभाषी को अनपढ़ समझने से भी पीछे नहीं हैं। हिंदी के उत्थान के लिए सबसे पहले तो हमें अपनी भाषा पर गर्व करना सीखना होगा, साथ ही लेखनशैली में भी हिंदी के शब्दों की ओर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। साहित्यसृजन के दौरान हमें जहाँ तक संभव हो सके अंग्रेजी के 'वे शब्द तथा उन उपकरणों के नाम जिसका मूल अंग्रेजी ही है तथा जिनका उपयोग हिंदी में करने से आमजनों को अर्थ ही समझ न आये, ऐसे शब्दों के अतिरिक्त' अनुपयोगी शब्दों से सदा दुरी बनाने की कोशिश करनी चाहिए। हिंदी तथा उर्दू समकक्षी भाषाएँ तथा दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरी हैं परन्तु, मैंने बहुत से ऐसे रचनाकारों की रचनाएँ पढ़ी है जो स्वयं को हिंदी साहित्यकार की श्रेणी में तो रखते हैं परन्तु अपनी रचनाओं में उर्दू का उपयोग भरपूर कर गौरव का अनुभव करते हैं।

हिंदी साहित्य जगत  में आज भी हिंदी साहित्य की कमी है। परन्तु, हमें हिंदी उत्थान के लिए निरंतर हिंदी की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए रुचिपूर्ण साहित्य निर्माण के प्रति समर्पित होना होगा तभी हिंदी को विश्वपटल पर स्थापित की जा सकती है। परन्तु, उनके समर्पण को भी नहीं भूलना चाहिए जो सतत हिंदी के सेवार्थ भारत तथा विश्व के कई स्थानों पर विभिन्न चरणों में काब्य गोष्ठी तथा साहित्य चर्चा का आयोजन करते रहते हैं।

Indibooks : आप अपने पाठकों से क्या कहना चाहेंगे।
Kundan Kumar : मैं अपने पाठकों से यही कहना चाहता हूँ कि वे मेरी रचनाओं का अवलोकन कर अपने विचारों को निःसंकोच मुझ तक प्रेषित कर मेरी लेखन को उत्कृष्ट करने में मदद करें।





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About the Book 

मेरी कल्पनाओ का चाँद, जो मेरे जीवन की कुछ भावनाओं, कल्पनाओं को समेटे है! कुछ प्यार, कुछ उलझनों में उलझी मेरी ‘चन्द्री – एक प्रेम कविता’ जिसमे प्रेम की चाह के साथ दुनिया का डर, परिवार का साथ और प्रभु की बनाई दुनिया की शिकायत है, चाहत है, वादें है, साथ जीने की इच्छा और तड़फते मन की व्यथा है! ‘चन्द्री’ जीवन के अनेक बिन्दुओं को छूती है कभी प्रेम, कभी ख्याल, कभी वास्तविकता में विचरती है और एक अधूरी प्रेम कहानी की तरह अधूरी ही है जो पूरी नही होती और ये ही प्यार की सार्थकता है, उसका चरम है, उत्कर्ष है, जादू है और आकर्षण का मूल मन्त्र है! ‘चन्द्री’ प्रेम, वफ़ा को परिभाषित करने की काेशिश है, दिल का जुनून है, चाहतों और कर्तव्यों में द्वन्द है, मन की बेबसी और उड़ने की उमंग है, और अंतत: चन्द्री एक ख्वाब है, ख्याल है, हकीकत है पर हकीकत से परे है।

About the Author

लेखक डॉ. प्रदीप कुमार सुमनाक्षर ने दिल्ली विश्व विद्यालय से बी.ए., एम.ए. (राज. विज्ञान) एवं एम. लिब. की शिक्षा प्राप्त की है। साथ ही आपको विध्यावाचस्पति और विधाविशारद (मानद) उपाधियाँ प्राप्त है। डॉ. प्रदीप कविता मंच, नई दिल्ली के अध्यक्ष और नीरज फेन्स क्लब, दिल्ली के सचिव भी है। लेखक की अब तक दर्जन भर से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें पाठकों द्वारा बहुत पसंद किया जा चुका है।

Description of Book

Author
Chandri
ISBN
978-93-87856-06-6
Language
Hindi
Binding
Paperback
Genre
Poetry
Pages
96
Publishing Year
January, 2020
Publisher
Prachi Digital Publication, Meerut, Uttar Pradesh

इस पुस्तक को यहां से प्राप्त कर सकते हैं-

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About the Book 

मेरी पुस्तक ‘ख्याल’ आपके हाथो में है और ये आप स्वयं महसूस कर सकते हो की कल्पना होते हुए भी वो केवल ख्याल मात्र नहीं है! वो शब्द जरुर है मगर उन शब्दों में जीवन है, भावनाएं है, गति है, जो एक मन से निकल कर दुसरे के मन को छू सकते है! अपने होने का अहसास करा सकते है, और ये ही साहित्य, कला या प्रेम का गुण है विशेषता है! ख्याल जीवन है, जीवन जीने की प्रेरणा है! अगर ख्यालो- खवाबों को जिन्दगी से निकल दें तो बस ……….. मानो जीवन, संसार विचार शून्य सा हो जाता है! रंगीन जिन्दगी मानो श्याम- श्वेत चित्र के मानद हो जाती है जिसमे सब कुछ है मगर रंग ही नहीं, उल्लास ही नहीं!

About the Author

लेखक डॉ. प्रदीप कुमार सुमनाक्षर ने दिल्ली विश्व विद्यालय से बी.ए., एम.ए. (राज. विज्ञान) एवं एम. लिब. की शिक्षा प्राप्त की है। साथ ही आपको विध्यावाचस्पति और विधाविशारद (मानद) उपाधियाँ प्राप्त है। डॉ. प्रदीप कविता मंच, नई दिल्ली के अध्यक्ष और नीरज फेन्स क्लब, दिल्ली के सचिव भी है। लेखक की अब तक दर्जन भर से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें पाठकों द्वारा बहुत पसंद किया जा चुका है।

Description of Book

Author
Khyaal
ISBN
978-93-87856-05-9
Language
Hindi
Binding
Paperback
Genre
Poetry
Pages
92
Publishing Year
January, 2020
Publisher
Prachi Digital Publication, Meerut, Uttar Pradesh

इस पुस्तक को यहां से प्राप्त कर सकते हैं-

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