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पिछले दिनों पूर्व न्यायाधीश एवं गज़लकार डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार का indiBooks द्वारा साक्षात्कार लिया गया था। इस साक्षात्कार के लिए हम आपका तहेदिल से धन्यवाद करना चाहते है, आपने अपना कीमती समय देकर हमें साक्षात्कार दिया। अभी हाल ही में प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के माध्यम से उनकी एक पुस्तक 'आदमी अरण्यों में' में प्रकाशित हुई है, जिसे पाठकों को जरूर पढ़ना चाहिए, क्योंकि गज़ल की आधुनिक दुनिया में डॉ. सुकुमार का बड़ा योगदान है। पेश है आपके लिए उनसे वार्ता के विशेष अंश-

indiBooks : आपका संक्षिप्त परिचय आपके शब्दों में ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : मेरा जन्म एवं शिक्षा वाराणसी में हुई। काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से मैंने हिन्दी में M.A. गोरखपुर विश्वविद्यालय से LL.B तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से साहित्य रत्न की की उपाधि प्राप्त की। 1975 में मैं उ0 प्र0 न्यायिक सेवा में नियुक्त हुआ तथा जनपद न्यायाधीश प्रयाग (इलाहाबाद) के पद से 2010 में सेवानिवृत्त हुआ तथा 2011 से 2016 तक राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0 प्र0, लखनउ में वरिष्ठ न्यायिक सदस्य एवं प्रभारी अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहा।

indiBooks : आपकी पहली पुस्तक कब प्रकाशित हुई थी ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : मेरी पहली पुस्तक हिन्दी गजल संग्रह ‘नदी के निकट’ संकल्प प्रकाशन, अलीगढ़ से 1985 में प्रकाशित हुई थी जिसमें मेरी 40 गजलें सम्मिलित थीं।

indiBooks : पहली पुस्तक के विषय के बारे में कुछ बताएं ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : पहली पुस्तक ‘नदी के निकट’ दो खण्डों में विभक्त है पहला खण्ड है ‘ओस नहायी घाम’ एवं दूसरा खण्ड है ‘गंध की ’महकती गली’। विषय की ताजगी एवं शुद्ध हिन्दी शब्दों के प्रयोग के लिए यह पुस्तक बहुचर्चित हुई तथा राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में इसकी व्यापक समीक्षाएं भी प्रकाशित हुईं। इस संग्रह पर मुझे फर्रूखाबाद की साहित्यिक संस्था ‘अभिव्यंजना’ द्वारा ‘प्रियदर्शनी’ पुरस्कार भी दिया गया।

indiBooks : आपको प्रकाशन करने के लिए प्रेरणा कहां से मिली ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : बचपन से ही मेरी साहित्यिक अभिरूचि थी। हिन्दी की अधिकांश पत्र-पत्रिकांए मैं पढ़ा करता था। विद्यालय की पत्रिकाओं में भी मेरी रचनाएं प्रमुखता से प्रकाशित होती थीं। न्यायिक सेवा में आने के बाद मैं साहित्य से थोड़ा अन्यमनस्क हो गया था उसी बीच गुरूवर डॉ0 हजारी प्रसाद द्विवेदी से इलाहाबाद के एक आयोजन में भेंट हुई ओर उन्होंने मुझे हिदायत दी कि नौकरी अच्छी है लेकिन लिखते-पढ़ते रहना। उनके प्रेरक आशीष से मैं पुनः लेखन में लग गया और धीरे-धीरे प्रकाशन की भी भूमिका बनती गयी।

indiBooks : पहली पुस्तक प्रकाशित कराने में क्या आपको किसी परेशानी का सामना करना पड़ा ? यदि हां तो वो परेशानी क्या रहीं ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : मुझे प्रकाशन में कोई परेशानी नहीं हुई। संकल्प संस्था के हम तीन मित्रों राष्ट्रीय ओज के कवि श्री रामगोपाल वार्ष्णेय, वरिष्ठ गीत गजलकार श्री लव कुमार ‘प्रणय’ एवं मैंने मिलकर प्रकाशन की योजना बनायी हममें से प्रत्येक की एक-एक पुस्तक प्रकाशित हुई बाद में मेरी अन्य दो पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं। ‘संकल्प के स्वर’ नाम से एक काव्य-संकलन भी प्रकाशित किया गया जिसका लोकार्पण राष्ट्रकवि श्री सोहन लाल द्विवेदी ने किया।

indiBooks : आपकी अब तक की प्रकाशित पुस्तकों के बारे में कुछ बताएं।
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : 14 हिन्दी गजल संग्रहों सहित मेरी 20 से अधिक काव्य-पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। न्यायिक सेवा में अधिक समय नहीं मिल पाता था। इसलिए अभी बहुत कुछ अप्रकाशित है। गजल संग्रहों में दो गजल संग्रह ‘गजल रामायण’ एवं ‘गजल भागवत’ अपने ढंग की अनोखी रचनाएं हैं इनमें मैंने संक्षिप्त में राम कथा व कृष्ण कथा कहने का प्रयास किया है जो कि गजल के इतिहास में एक नयी उपलब्धि कही जा सकती है।

indiBooks : अब तक प्रकाशित पुस्तकों में आपकी सबसे पसंदीदा पुस्तक कौन सी है और क्यों ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : इस प्रश्न का उत्तर देना सरल नहीं है। रचनाकार को तो अपनी सभी पुस्तकें प्रिय होती हैं। फिर भी ‘कंठ नीला हो गया है’ में मेरी 121 गजलें संग्रहीत हैं उनमें से अधिकांश गजलें बहुत लोकप्रिय हुईं और मुझे भी प्रिय हैं। कुछ गजलों का आडियो कैसेट भी ‘गजल के दो पल’ नाम से बना जिनको श्री दुष्यंत सिंह ने अपना स्वर दिया है एवं लोगों ने उसे भी पसंद किया।

indiBooks : आप अपने जीवन में किसे अपना आदर्श मानते हैं और क्यों?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : विद्यार्थी जीवन से ही स्वामी विवेकानन्द को मैं अपना आदर्श मानता रहा हूं। भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति को उन्होंने विश्व में स्थापित किया तथा स्वयं साधुओं-सा जीवन व्यतीत किया। उनके भाषण एवं कविताएं भारतीयता से ओत-प्रोत हैं।

indiBooks : अब तक प्रकाशकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : मेरे ज्यादातर प्रकाशक मेरे मित्र एवं अग्रज-तुल्य रहे हैं उन्होंने अधिकारपूर्वक मेरी डायरियों से कविताओं को निकालकर संग्रह प्रकाशित किए। अतः प्रकाशन के लिए मैं उनका आभार ही मानता हूं।

indiBooks : आप लेखन के लिए समय कैसे निकालते हैं ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : मेरे लेखन का प्रारम्भ सन् 1962 से होता है जब मैं हाई स्कूल का छात्र था। मैं सेवा में 1975 में आया इस बीच मैंने पढ़ाई के साथ-साथ प्रचुर लेखन किया जिसमें गीतों और कविताओं की संख्या अधिक है। सेवा काल में समय कम मिल पाता था इसीलिए झुकाव गजल की ओर हुआ जो कम समय में बन जाती है। शुरू से ही मुझे देर रात तक जगने-पढ़ने की आदत रही इसीलिए मुझे लेखन के लिए कभी समय का अभाव नहीं रहा। अब सेवा-निवृत्त होने के बाद तो यह प्रश्न वैसे भी बेमानी हो गया है।

indiBooks : आपकी पसंद की लेखन विधा कौन सी है ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : चूंकि 14 हिन्दी गजल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं इसलिए मेरी पहली पहचान तो हिन्दी गजलकार की ही है वैसे कविताओं, गीतों एवं प्रबन्ध-काव्यों में भी मेरी बहुत अभिरूचि है तथा कुछ कविता संग्रह, मुक्तक संग्रह एवं एक काव्य-नाट्य भी प्रकाशित हो चुका है।

indiBooks : क्या आपका कोई Ideal लेखक या लेखिका है ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : वैसे तो लेखक खुद अपना Ideal होता है लेकिन यदि किसी एक साहित्यकार का नाम लेना हो तो मैं यह स्वीकार करूंगा कि महाकवि जयशंकर प्रसाद ही मेरे Ideal लेखक हैं।

indiBooks : आपके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है जिसने आपके मित्रों व परिवार को बेहद खुशी दी ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : कवि एवं साहित्यकार होने के नाते मुझे वरिष्ठ साहित्यकारों एवं मनीषियों का सानिध्य एवं आशीर्वाद सदैव मिलता रहा। राष्ट्रकवि श्री सोहनलाल द्विवेदी मेरे आवास पर एक सप्ताह तक रहे। श्री अक्षय कुमार जैन, श्री राजेन्द्र अवस्थी, बाल साहित्यकार श्री द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का भी मुझे व मेरे परिवार को आशीष मिलता रहा। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम डॉ0 शंकर दयाल शर्मा से भी राष्ट्रपति भवन में जाकर उनका आशीष लेने का सौभाग्य मिला। उनसे हिन्दी गजल पर लम्बी चर्चा हुई। जिला कचहरी के एक न्यायाधीश के लिए ये सब स्मृतियां अनमोल निधियां ही तो हैं।

indiBooks : क्या आपके जीवन में कोई ऐसी घटना घटित हुई है जिसे आप कभी भूलना नहीं चाहेंगे ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : एक बार प्रयाग के महाकुंभ में हम परिवार सहित स्नान के लिए गए थे। भोर का समय था संगम पर काफी भीड़ थी परिवार के सब लोग नहाकर निकले तो अंत में मैं अपने जीजाजी के साथ नहाने के लिए नदी में उतरा। एक दो डुबकियां लगाने के बाद बिजलियों की चकाचौंध में हमें दिशाभ्रम हो गया और हम संगम में नदी के उस पार निकल गए। उधर भी काफी भीड़ थी और हम घंटों तक परिवार वालों को ढूंढते रहे। दो-तीन घंटे तक हम भीगे वस्त्र में ही ठंडक में इधर से उधर भागते रहे जब सूरज निकला तब हमको पता चला कि हम नदी के उस पार हैं। तीन-चार घंटे के बाद परिवार वालों से मिलना हुआ आप स्वयं समझ सकते हैं कि इस बीच परिवार वालों की क्या हालत हुई होगी ? एक और प्रसंग गंगा में नहाने का ही है। नहाते वक्त मेरी रूद्राक्ष की माला नदी में बह गई। मैंने शिव मंदिर में बैठकर जाप प्रारंभ किया और जाप पूर्ण होते-होते गंगा ने मेरी माला लौटा दी। यह मेरे लिए अलौकिक चमत्कार से कम न था। और ऐसी घटनाए क्या कभी भूली जा सकती हैं ?

indiBooks : हिन्दी साहित्य का भविष्य आपकी नजर में कैसा है ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : आज हिन्दी का स्थान विश्व की तीन प्रमुख भाषाओ में एक है ऐसे में हिन्दी साहित्य को भी अनुवादों के जरिए विश्व-मंच पर स्थापित करना होगा साहित्य के अतिरिक्त अन्य विषयों को भी हिन्दी माध्यम से प्रस्तुत करने से ही लोगों की अभिरूचि हिन्दी साहित्य में भी बढ़ेगी। इण्टरनेट ने इस दिशा में बड़ा काम किया है और निरंतर सक्रिय है। मैं नये लेखकों से यह भी अपेक्षा करूंगा कि वे वरिष्ठ साहित्यकारों के साहित्य का निरंतर अध्ययन करते रहें जिससे उनको अपने लेखन की दिशा तय करने में भी सुविधा होगी। कुल मिलाकर हिंदी साहित्य का भविष्य उल्लासपूर्ण ही है।

indiBooks : आप अपने पाठकों से क्या कहना चाहेंगे ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : बच्चन जी ने कहा है कि सिफारिश से न तो प्रेमी मिलते हैं और न पाठक दिनकर जी ने भी कहा था कि लेखक का काम अपनी मेज से शुरू होकर पाठक की मेज पर समाप्त होता है। ऐसी स्थिति में मैं पाठकों से यह स्नेहिल अपेक्षा तो करना ही चाहूंगा कि वे अपनी तिक्त-मधुर प्रतिक्रियाओं से लेखकों को सदैव अवगत कराते रहें जिससे लेखकों को भी अपनी त्रुटियों का पता चले और यह भी पता चले कि आज का पाठक वास्तव में क्या पढ़ना चाहता है। साथ ही साथ मैं indiBooks को भी इस साहित्यिक अवदान के लिए विशेष साधुवाद देता हूं। यह आत्मीयता ऐसे ही बनी रहनी चाहिए।



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About the Book 

‘आदमी अरण्यों में’ शीर्षक ही बहुत कुछ कह सकने में समर्थ है। हर आदमी के मन में एक ‘अरण्य’ होता है, चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो। तुलसी के ‘मानस’ में भी एक ‘अरण्य’ है। राम का वह जीवन जो राम को ‘राम’ बनाता है, इसी ‘अरण्य’ से प्रारम्भ होता है। आज की गजल भी तरह-तरह के आरण्यक संदर्भों में खो गयी है। कलम रुकनी नहीं चाहिए। बस, इसी साधना-याचना-आराधना-अर्चना-आशा- अभिलाषा और विश्वास के साथ कि-
जो कि कहना चाहती है,
आज कहने दो गजल को।

 About the Author

लेखक डा. चन्द्रभाल सुकुमार पूर्व न्यायाधीश एवं साहित्यकार है। उनकी अब तक दजर्नों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। दो दर्जन से अधिक सह-संकलनों में रचनाएं संकलित, प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारित। शताधिक साहित्यिक, सांस्कृतिक, न्यायिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित/अलंकृत।
आपकी डॉ0 भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा द्वारा ‘‘समकालीन हिन्दी गजल को चन्द्रभाल सुकुमार का प्रदेय’’ विषयक शोध प्रबन्ध पी.एच.डी. हेतु स्वीकृत है। काव्यायनी साहित्यिक वाटिका (तुलसी जयंती, 1984) के संस्थापक-अध्यक्ष है। 35 वर्षों की न्यायिक सेवा के उपरांत जनपद न्यायाधीश, इलाहाबाद के पद से 2010 में सेवा निवृत्त होने के बाद 2011 में राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0 प्र0 लखनऊ में वरिष्ठ न्यायिक सदस्य के पद पर नियुक्त एवं प्रभारी अध्यक्ष के पद से 2016 में सेवा-निवृत्त।

Description of Book

Author
डा. चन्द्रभाल सुकुमार
ISBN
978-9387856844
Language
Hindi
Binding
Paperback
Genre
गज़ल
Pages
96
Publishing Year
2019
Price
100.00
indiBooks Rating
★★★★☆ (4.8)
Publisher
Prachi Digital Publication, Meerut, Uttar Pradesh

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पूर्व न्यायाधीश एवं वरिष्ठ साहित्यकार डा. चन्द्रभाल सुकुमार का गज़ल संग्रह ‘आदमी अरण्यों में’ प्रकाशित हो चुका है। स्वभाव से मृदुभाषी लेखक डा. सुकुमार वर्तमान में वाराणसी में निवास कर रहे है। डा. सुकुमार अपने पाठकों को बहुत ज्यादा महत्व देते है। उनके पुस्तक की भूमिका के अनुसार उनका मानना है कि सत्य है कि हर रचना विशिष्ट होती है और हर पाठक भी उतना ही विशिष्ट होता है। जिस क्षण रचना का जन्म होता है क्या उसे बांधा जा सकता है ? पाठक की भी मनःस्थिति हर क्षण एक-सी नहीं रहती। तभी तो कहा गया है -
क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयताया:
‘आदमी अरण्यों में’ शीर्षक ही बहुत कुछ कह सकने में समर्थ है। हर आदमी के मन में एक ‘अरण्य’ होता है, चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो। तुलसी के ‘मानस’ में भी एक ‘अरण्य’ है। राम का वह जीवन जो राम को ‘राम’ बनाता है, इसी ‘अरण्य’ से प्रारम्भ होता है। आज की गजल भी तरह-तरह के आरण्यक संदर्भों में खो गयी है। कलम रुकनी नहीं चाहिए। बस, इसी साधना-याचना-आराधना-अर्चना-आशा- अभिलाषा और विश्वास के साथ कि- 
जो कि कहना चाहती है,
आज कहने दो गजल को।
डा. चन्द्रभाल सुकुमार के गज़ल के क्षेत्र में योगदान का महत्व इस बात से लगाया जा सकता है, डॉ0 भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा द्वारा ‘‘समकालीन हिन्दी गजल को चन्द्रभाल सुकुमार का प्रदेय’’ विषयक शोध प्रबन्ध पी.एच.डी. हेतु स्वीकृत है।
डा. चन्द्रभाल सुकुमार के बारे में बतातें चले कि 35 वर्षों की न्यायिक सेवा के उपरांत जनपद न्यायाधीश, इलाहाबाद के पद से 2010 में सेवा निवृत्त होने के बाद 2011 में राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0 प्र0 लखनऊ में वरिष्ठ न्यायिक सदस्य के पद पर नियुक्त एवं प्रभारी अध्यक्ष के पद से 2016 में सेवा-निवृत्त रह चुके है। डा. सुकुमार काव्यायनी साहित्यिक वाटिका (तुलसी जयंती, 1984) के संस्थापक-अध्यक्ष है।
प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के डायरेक्टर राजेन्द्र सिंह बिष्ट ने बताया कि  डा. चन्द्रभाल सुकुमार का यह गज़ल संग्रह बहुत ही शानदार है, जो पाठकों को बहुत ही पसंद आयेगा। उन्होने कहा कि डा. सुकुमार जी का गज़ल के क्षेत्र में अुतलनीय योगदान है। जिसका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता है। उन्होने कहा कि इस पुस्तक को अमेजन, फिल्पकार्ट व स्नेपडील पर डिस्काउंट के साथ आर्डर की जा सकती है।
डा. चन्द्रभाल सुकुमार की अब तक लगभग 2 दर्जन से अधिक गज़ल संग्रह प्रकाशत हो चुके है। इसके अलावा डा. सुकुमार के अब तक दो दर्जन से अधिक सह-संकलनों में रचनाएं संकलित, प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारित भी होती रहती है।  डा. चन्द्रभाल सुकुमार को उनके गज़ल एवं साहित्य के क्षेत्र में अतुल्नीय योगदान के लिए शताधिक साहित्यिक, सांस्कृतिक, न्यायिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित/अलंकृत किया जा चुका है।





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About the Book 

३4०० ईसापूर्व, भारत।
अलगावों से अयोध्या कमज़ोर हो चुकी थी। एक भयंकर युद्ध अपना कर वसूल रहा था। नुक्सान बहुत गहरा था। लंका का राक्षस राजा, रावण पराजित राज्यों पर अपना शासन लागू नहीं करता था, बल्कि वह वहां के व्यापार को नियंत्रित करता था। साम्राज्य से सारा धन चूस लेना उसकी नीति थी। जिससे सप्तसिंधु की प्रजा निर्धनता, अवसाद और दुराचरण में घिर गई। उन्हें किसी ऐसे नेता की ज़रूरत थी, जो उन्हें दलदल से बाहर निकाल सके।
नेता उनमें से ही कोई होना चाहिए था। कोई ऐसा जिसे वो जानते हों। एक संतप्त और निष्कासित राजकुमार। एक राजकुमार जो इस अंतराल को भर सके। एक राजकुमार जो राम कहलाए।
वह अपने देश से प्यार करते हैं। भले ही उसके वासी उन्हें प्रताड़ित करें। वह न्याय के लिए अकेले खड़े हैं। उनके भाई, उनकी सीता और वह खुद इस अंधकार के समक्ष दृढ़ हैं।
क्या राम उस लांछन से ऊपर उठ पाएंगे, जो दूसरों ने उन पर लगाए हैं?
क्या सीता के प्रति उनका प्यार, संघर्षों में उन्हें थाम लेगा?
क्या वह उस राक्षस का खात्मा कर पाएंगे, जिसने उनका बचपन तबाह किया?
क्या वह विष्णु की नियति पर खरा उतरेंगे?

अमीश की नई सीरिज “रामचंद्र श्रृंखला” के साथ एक और ऐतिहासिक सफ़र की शुरुआत करते हैं।

 About the Author

आई.आई.एम (कोलकाता) से प्रशिक्षित और 1974 में पैदा हुए अमीश एक बैंकर से सफल लेखक तक का सफ़र तय कर चुके हैं। अपने पहले उपन्यास मेलूहा के मृत्युंजय (शिव रचना त्रय की प्रथम पुस्तक) की सफलता से प्रोत्साहित होकर उन्होने फानेंशियल सर्विस का 14 साल का करियर छोड़कर लेखन में लग गए। इतिहास, पौराणिक कथाओं एवं दर्शन के प्रति उनके जुनून ने उन्हें विश्व के धर्मों की खूबसूरती और अर्थ समझने के लिए प्रेरित किया। अमीश अपनी पत्नी प्रीति और बेटे नील के साथ मुंबई में रहते हैं।

Description of Book

Author
Tripathi Amish
ISBN
978-9385152153
Language
Hindi
Binding
Paperback
Genre
Fiction
Pages
350
Publishing Year
2015
Price
350.00
Rating on Flipkart
★★★★☆ (4.4)
Publisher
Westland




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indiBooks : आपका संक्षिप्त परिचय आपके शब्दों में?
मालती मिश्रा : मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ, मेरा जन्म ग्राम- देवरी, जिला- संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। मेरी शिक्षा कानपुर से तथा परास्नातक की शिक्षा दिल्ली से हुई। वर्तमान समय में मैं दिल्ली में ही रहती हूँ। मैं प्राइवेट विद्यालय में हिंदी विषय की अध्यापिका हूँ। लेखन मेरा शौक है।

indiBooks : आपकी पहली पुस्तक कब प्रकाशित हुई थी?
मालती मिश्रा : मेरी पहली पुस्तक फरवरी 2017 में प्रकाशित हुई।

indiBooks : पहली पुस्तक के विषय के बारे में कुछ बताएं। 
मालती मिश्रा : मेरी पहली पुस्तक ‘अंतर्ध्वनि’ एक काव्य संग्रह है, इसमें 73 कविताएँ संकलित हैं।

indiBooks : आपको पुस्तक प्रकाशन करने के लिए प्रेरणा कहां से मिली?
मालती मिश्रा : मेरे ब्लॉग पर मेरी कविताएँ पढ़कर मेरे फॉलोअर्स और मित्रों ने ही मुझे प्रकाशन के लिए प्रेरित किया।

indiBooks : पहली पुस्तक प्रकाशित कराने में क्या आपको किसी परेशानी का सामना करना पड़ा? यदि हां तो वो परेशानी क्या रहीं? 
मालती मिश्रा : बस पब्लिकेशन ढूढ‌ने में ही थोड़ी अनिश्चितता थी मैं किसी को जानती नहीं थी, फिर फेसबुक पर ही एक नए प्रकाशन के ऑफर को पढ़ा, जो कि औरों के मुकाबले सस्ता था। फिर फोन पर बात करके थोड़ा रिस्क लेते हुए सोचा, करवाते हैं। 

indiBooks : आपकी अब तक की प्रकाशित पुस्तकों के बारे में कुछ बताएं।
मालती मिश्रा : अब तक मेरी तीन एकल पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, एक ‘अंतर्ध्वनि’ (काव्य संग्रह), दूसरी है- ‘इंतज़ार’ अतीत के पन्नों से, ये एक कहानी संग्रह है। तीसरी मेरी एक काव्य संग्रह की ई-बुक है ‘मैं ही साँझ और भोर हूँ’। इसके अलावा मेरी कई साझा संग्रह भी आ चुकी हैं।

indiBooks : आप अपने जीवन में किसे अपना आदर्श मानते है और क्यों?
मालती मिश्रा : मेरे आदर्श मेरे स्वर्गवासी बाबूजी (पिताजी) रहे हैं, क्योंकि मेरे बाबूजी उस दौर में जब हमारे गाँव में लोग लड‌कियों को पढाने के खिलाफ थे तब मेरे बाबूजी ने न सिर्फ मुझे पढ़ाया बल्कि गाँव के कुछ और लोगों को भी अपनी बेटियों को पढा‌ने के लिए प्रेरित किया। उनमें सच को सच और झूठ को झूठ कहने का साहस था और यही शिक्षा उन्होंने हम भाई बहन को भी दिया।

indiBooks : अब तक प्रकाशकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?
मालती मिश्रा : मैंने अभी तक सिर्फ एक ही प्रकाशक से अपनी दोनों पुस्तकें प्रकाशित करवाई हैं। तो मैं ज्यादा कुछ नहीं जानती प्रकाशकों के विषय में, पर यहाँ से जो अनुभव मिला है वो तो यही है कि पुस्तक प्रकाशित करवाओ और भूल जाओ।

indiBooks : आप लेखन के लिए समय कैसे निकालते है?
मालती मिश्रा : लेखन मेरा शौक है इसलिए यदि दिन में समय नहीं होता तो रात को लिखती हूँ चाहे अपनी नींद थोड़ी कम करनी पड़े।

indiBooks : आपकी पसंद की लेखन विद्या कौन सी है?
मालती मिश्रा : वैसे मैं कविता, लेख, समीक्षा और कहानी लिखती हूँ पर मेरी पसंदीदा विधा है- कहानी।

indiBooks : क्या आपका कोई ideal लेखक या लेखिका  है?
मालती मिश्रा : जी हाँ,  मुंशी प्रेमचंद

indiBooks : आपके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है, जिसने आपके मित्रों व परिवार को बेहद खुशी दी?
मालती मिश्रा : मेरे लेखन का मूर्त रूप लेकर आना।

indiBooks : क्या आपके जीवन में कोई ऐसी घटना घटित हुई है, जिसे आप कभी भूलना नहीं चाहेंगे?
मालती मिश्रा : मेरी हर वो उपलब्धि जो मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित करती हो।

indiBooks : हिन्दी साहित्य का भविष्य आपकी नज़र में कैसा है?
मालती मिश्रा : आजकल जिस प्रकार से लोग हिंदी के प्रति जागरूक हो रहे हैं उसको देखते हुए आशा की जा सकती है कि हिंदी साहित्य का भविष्य उज्ज्वल होगा। हाँ, रास्ता कठिन है बहुत अधिक मेहनत की आवश्यकता है पर सोशल मीडिया का दौर है तो यह हो सकता है।

indiBooks : आप अपने पाठकों से क्या कहना चाहेंगे।
मालती मिश्रा : यही कि अपनी मातृभाषा व राष्ट्र्भाषा के प्रति सम्मान दर्शाते हुए अन्य भाषाओं के साथ हिंदी को नियमित रूप से पढ़ने की आदत डालें, किताबें हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं। आपका पढ़ना ही हिंदी लेखन को बढ़ावा दे सकता है।


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About the Book 

This is what I Got From all of You This is My First Poem Book. I want to tell you that I am Interested in Hindi – Lyrics Area so mostly You will get from me Lyrics But here in this book I didn’t share my all Lyrics few Lyrics you will defiantly get from this book. Here from this book you will get different types of thinks Like Poem, Geet, & Mostly you will get in this book Ghazals…. and yes you will defiantly Enjoy This Beautiful Book. Thank You. Neelendra Shukla ” Neel ”

 About the Author

Neelendra Shukla ‘Neel’ is a resident of Raebareli, Uttar Pradesh. This is his first book, through this book, he wants to dissolve the evils spread in society. He is currently a student of MA (Hindi) in Chinmay University, Kerala. He has passed bachelor’s degree from Banaras School. Neelendra is interested in Hindi Lyricist and he wants to become a Good Lyricist Artist in the future. They say that as a Lyricist I want to spread my whole thoughts to the Nation & the world.

Description of Book

Author
Neelendra Shukla 'Neel'
ISBN
978-9387856820
Language
Hindi
Binding
Paperback
Genre
Poetry
Pages
96
Publishing Year
2019
Price
95.00
indiBooks Rating
★★★★☆ (4.8)
Publisher
Prachi Digital Publication, Meerut, Uttar Pradesh

इस पुस्तक को यहां से प्राप्त कर सकते हैं-

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 About the Book 

समीक्षक डॉ. ज्योत्सना सिंह की समीक्षा के युवा लेखिका मालती मिश्रा ने 13 कहानियों के संग्रह को अपने अनुभवों की स्याही से भावनाओं की लेखनी के साथ समसामयिक विषयों के चिंतन को बखूबी उकेरा है।
इस कहानीं संग्रह में ऐसा प्रतीत होता है कि लेखिका समाज के आसपास के वातावरण में घटित होने वाली घटनाओं से अत्यधिक प्रभावित है, प्रथम कहानीं इंतजार का सिलसिला, बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है बेटे की वाट जोहते बूढ़े माँ बाप, फर्ज निभाने वाला मित्र, अंतरात्मा को झकझोर देने वाली कहानीं है।
दूसरी कहानीं शिक़वे- गिले, मात्र संदेह के आधार पर दो सहेलियों के मध्य उत्पन्न हुए गिले शिक़वे और सुखान्त प्रणय की कल्पना को प्रस्तुत करती कहानीं। तीसरी कहानीं परिवर्तन जिसमें कानून व्यवस्था के साथ खिलबाड़ करने वाले युवक और अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित पुलिस कर्मियों के परिवार जनों और उनकी समस्याओं का बहुत सटीक चित्रण किया है आठ साल की बच्ची की मनोदशा, उसका डर, एवं विचार मन्थन को लेखिका ने खूब सराहनीय वर्णन किया है। चौथी कहानीं वापसी की ओर कहानीं में  काका-काकी का निश्छल प्रेम समर्पण, विजय का त्याग, ग्रामीण समाज की अशिक्षित दकियानूसी सोच और संकीर्ण मानसिकता का समन्वित चित्रण किया गया है। पाँचवी कहानीं दासता के भाव, यह मुंशी प्रेमचंद की कहानियों से प्रभावित कल्पना प्रतीत हो रही है। आज समाज में बहुत परिवर्तन हो चुका है आज पूरा सवर्ण समाज ही शोषित है। एक स्त्री पात्र दीदी और मास्टर जी की लड़की के आत्मविश्वास और साहस की कहानीं है, जिसके माध्यम से कहानीं एक  मोड़ पर समाप्त करना लेखिका के लेखन की कार्यकुशलता का परिचायक है। छठवीं कहानीं फैंसला विवशताओं से घिरी, सच्चे प्रेम की चाहत में दोहराये पर खड़ी ,संघर्षों से जूझती हुई स्त्री के मन की पीड़ा का बहुत स्वाभाविक चित्रण है इस प्रकार यह कहानी वर्तमान युग मे बिखरते मध्यवर्गीय परिवार की त्रासदी तथा मूल्यों के विघटन की समस्या पर प्रकाश डालती है।

 About the Author

मालती मिश्रा प्रसिद्व ब्लॉगर है और हिन्दी साहित्यकार है।

DESCRIPTION OF BOOK
Author
मालती मिश्रा
ISBN
978-9388049009
Language
हिन्दी
Page & Type
Paperback
Genre
साहित्य
Pages
N/A
First Edition
2018
Revision
1st Edition
Price
175
Publisher
Samdarshi Prakashan
indiBooks Rating
☆ (4.5)


http://fkrt.it/M3vMy2NNNN