पाठकों से यह स्नेहिल अपेक्षा तो करना ही चाहूंगा कि वे अपनी तिक्त-मधुर प्रतिक्रियाओं से लेखकों को सदैव अवगत कराते रहें जिससे लेखकों को भी अपनी त्रुटियों का पता चले और यह भी पता चले कि आज का पाठक वास्तव में क्या पढ़ना चाहता है।



पिछले दिनों पूर्व न्यायाधीश एवं गज़लकार डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार का indiBooks द्वारा साक्षात्कार लिया गया था। इस साक्षात्कार के लिए हम आपका तहेदिल से धन्यवाद करना चाहते है, आपने अपना कीमती समय देकर हमें साक्षात्कार दिया। अभी हाल ही में प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के माध्यम से उनकी एक पुस्तक 'आदमी अरण्यों में' में प्रकाशित हुई है, जिसे पाठकों को जरूर पढ़ना चाहिए, क्योंकि गज़ल की आधुनिक दुनिया में डॉ. सुकुमार का बड़ा योगदान है। पेश है आपके लिए उनसे वार्ता के विशेष अंश-

indiBooks : आपका संक्षिप्त परिचय आपके शब्दों में ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : मेरा जन्म एवं शिक्षा वाराणसी में हुई। काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से मैंने हिन्दी में M.A. गोरखपुर विश्वविद्यालय से LL.B तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से साहित्य रत्न की की उपाधि प्राप्त की। 1975 में मैं उ0 प्र0 न्यायिक सेवा में नियुक्त हुआ तथा जनपद न्यायाधीश प्रयाग (इलाहाबाद) के पद से 2010 में सेवानिवृत्त हुआ तथा 2011 से 2016 तक राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0 प्र0, लखनउ में वरिष्ठ न्यायिक सदस्य एवं प्रभारी अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहा।

indiBooks : आपकी पहली पुस्तक कब प्रकाशित हुई थी ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : मेरी पहली पुस्तक हिन्दी गजल संग्रह ‘नदी के निकट’ संकल्प प्रकाशन, अलीगढ़ से 1985 में प्रकाशित हुई थी जिसमें मेरी 40 गजलें सम्मिलित थीं।

indiBooks : पहली पुस्तक के विषय के बारे में कुछ बताएं ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : पहली पुस्तक ‘नदी के निकट’ दो खण्डों में विभक्त है पहला खण्ड है ‘ओस नहायी घाम’ एवं दूसरा खण्ड है ‘गंध की ’महकती गली’। विषय की ताजगी एवं शुद्ध हिन्दी शब्दों के प्रयोग के लिए यह पुस्तक बहुचर्चित हुई तथा राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में इसकी व्यापक समीक्षाएं भी प्रकाशित हुईं। इस संग्रह पर मुझे फर्रूखाबाद की साहित्यिक संस्था ‘अभिव्यंजना’ द्वारा ‘प्रियदर्शनी’ पुरस्कार भी दिया गया।

indiBooks : आपको प्रकाशन करने के लिए प्रेरणा कहां से मिली ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : बचपन से ही मेरी साहित्यिक अभिरूचि थी। हिन्दी की अधिकांश पत्र-पत्रिकांए मैं पढ़ा करता था। विद्यालय की पत्रिकाओं में भी मेरी रचनाएं प्रमुखता से प्रकाशित होती थीं। न्यायिक सेवा में आने के बाद मैं साहित्य से थोड़ा अन्यमनस्क हो गया था उसी बीच गुरूवर डॉ0 हजारी प्रसाद द्विवेदी से इलाहाबाद के एक आयोजन में भेंट हुई ओर उन्होंने मुझे हिदायत दी कि नौकरी अच्छी है लेकिन लिखते-पढ़ते रहना। उनके प्रेरक आशीष से मैं पुनः लेखन में लग गया और धीरे-धीरे प्रकाशन की भी भूमिका बनती गयी।

indiBooks : पहली पुस्तक प्रकाशित कराने में क्या आपको किसी परेशानी का सामना करना पड़ा ? यदि हां तो वो परेशानी क्या रहीं ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : मुझे प्रकाशन में कोई परेशानी नहीं हुई। संकल्प संस्था के हम तीन मित्रों राष्ट्रीय ओज के कवि श्री रामगोपाल वार्ष्णेय, वरिष्ठ गीत गजलकार श्री लव कुमार ‘प्रणय’ एवं मैंने मिलकर प्रकाशन की योजना बनायी हममें से प्रत्येक की एक-एक पुस्तक प्रकाशित हुई बाद में मेरी अन्य दो पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं। ‘संकल्प के स्वर’ नाम से एक काव्य-संकलन भी प्रकाशित किया गया जिसका लोकार्पण राष्ट्रकवि श्री सोहन लाल द्विवेदी ने किया।

indiBooks : आपकी अब तक की प्रकाशित पुस्तकों के बारे में कुछ बताएं।
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : 14 हिन्दी गजल संग्रहों सहित मेरी 20 से अधिक काव्य-पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। न्यायिक सेवा में अधिक समय नहीं मिल पाता था। इसलिए अभी बहुत कुछ अप्रकाशित है। गजल संग्रहों में दो गजल संग्रह ‘गजल रामायण’ एवं ‘गजल भागवत’ अपने ढंग की अनोखी रचनाएं हैं इनमें मैंने संक्षिप्त में राम कथा व कृष्ण कथा कहने का प्रयास किया है जो कि गजल के इतिहास में एक नयी उपलब्धि कही जा सकती है।

indiBooks : अब तक प्रकाशित पुस्तकों में आपकी सबसे पसंदीदा पुस्तक कौन सी है और क्यों ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : इस प्रश्न का उत्तर देना सरल नहीं है। रचनाकार को तो अपनी सभी पुस्तकें प्रिय होती हैं। फिर भी ‘कंठ नीला हो गया है’ में मेरी 121 गजलें संग्रहीत हैं उनमें से अधिकांश गजलें बहुत लोकप्रिय हुईं और मुझे भी प्रिय हैं। कुछ गजलों का आडियो कैसेट भी ‘गजल के दो पल’ नाम से बना जिनको श्री दुष्यंत सिंह ने अपना स्वर दिया है एवं लोगों ने उसे भी पसंद किया।

indiBooks : आप अपने जीवन में किसे अपना आदर्श मानते हैं और क्यों?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : विद्यार्थी जीवन से ही स्वामी विवेकानन्द को मैं अपना आदर्श मानता रहा हूं। भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति को उन्होंने विश्व में स्थापित किया तथा स्वयं साधुओं-सा जीवन व्यतीत किया। उनके भाषण एवं कविताएं भारतीयता से ओत-प्रोत हैं।

indiBooks : अब तक प्रकाशकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : मेरे ज्यादातर प्रकाशक मेरे मित्र एवं अग्रज-तुल्य रहे हैं उन्होंने अधिकारपूर्वक मेरी डायरियों से कविताओं को निकालकर संग्रह प्रकाशित किए। अतः प्रकाशन के लिए मैं उनका आभार ही मानता हूं।

indiBooks : आप लेखन के लिए समय कैसे निकालते हैं ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : मेरे लेखन का प्रारम्भ सन् 1962 से होता है जब मैं हाई स्कूल का छात्र था। मैं सेवा में 1975 में आया इस बीच मैंने पढ़ाई के साथ-साथ प्रचुर लेखन किया जिसमें गीतों और कविताओं की संख्या अधिक है। सेवा काल में समय कम मिल पाता था इसीलिए झुकाव गजल की ओर हुआ जो कम समय में बन जाती है। शुरू से ही मुझे देर रात तक जगने-पढ़ने की आदत रही इसीलिए मुझे लेखन के लिए कभी समय का अभाव नहीं रहा। अब सेवा-निवृत्त होने के बाद तो यह प्रश्न वैसे भी बेमानी हो गया है।

indiBooks : आपकी पसंद की लेखन विधा कौन सी है ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : चूंकि 14 हिन्दी गजल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं इसलिए मेरी पहली पहचान तो हिन्दी गजलकार की ही है वैसे कविताओं, गीतों एवं प्रबन्ध-काव्यों में भी मेरी बहुत अभिरूचि है तथा कुछ कविता संग्रह, मुक्तक संग्रह एवं एक काव्य-नाट्य भी प्रकाशित हो चुका है।

indiBooks : क्या आपका कोई Ideal लेखक या लेखिका है ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : वैसे तो लेखक खुद अपना Ideal होता है लेकिन यदि किसी एक साहित्यकार का नाम लेना हो तो मैं यह स्वीकार करूंगा कि महाकवि जयशंकर प्रसाद ही मेरे Ideal लेखक हैं।

indiBooks : आपके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है जिसने आपके मित्रों व परिवार को बेहद खुशी दी ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : कवि एवं साहित्यकार होने के नाते मुझे वरिष्ठ साहित्यकारों एवं मनीषियों का सानिध्य एवं आशीर्वाद सदैव मिलता रहा। राष्ट्रकवि श्री सोहनलाल द्विवेदी मेरे आवास पर एक सप्ताह तक रहे। श्री अक्षय कुमार जैन, श्री राजेन्द्र अवस्थी, बाल साहित्यकार श्री द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का भी मुझे व मेरे परिवार को आशीष मिलता रहा। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम डॉ0 शंकर दयाल शर्मा से भी राष्ट्रपति भवन में जाकर उनका आशीष लेने का सौभाग्य मिला। उनसे हिन्दी गजल पर लम्बी चर्चा हुई। जिला कचहरी के एक न्यायाधीश के लिए ये सब स्मृतियां अनमोल निधियां ही तो हैं।

indiBooks : क्या आपके जीवन में कोई ऐसी घटना घटित हुई है जिसे आप कभी भूलना नहीं चाहेंगे ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : एक बार प्रयाग के महाकुंभ में हम परिवार सहित स्नान के लिए गए थे। भोर का समय था संगम पर काफी भीड़ थी परिवार के सब लोग नहाकर निकले तो अंत में मैं अपने जीजाजी के साथ नहाने के लिए नदी में उतरा। एक दो डुबकियां लगाने के बाद बिजलियों की चकाचौंध में हमें दिशाभ्रम हो गया और हम संगम में नदी के उस पार निकल गए। उधर भी काफी भीड़ थी और हम घंटों तक परिवार वालों को ढूंढते रहे। दो-तीन घंटे तक हम भीगे वस्त्र में ही ठंडक में इधर से उधर भागते रहे जब सूरज निकला तब हमको पता चला कि हम नदी के उस पार हैं। तीन-चार घंटे के बाद परिवार वालों से मिलना हुआ आप स्वयं समझ सकते हैं कि इस बीच परिवार वालों की क्या हालत हुई होगी ? एक और प्रसंग गंगा में नहाने का ही है। नहाते वक्त मेरी रूद्राक्ष की माला नदी में बह गई। मैंने शिव मंदिर में बैठकर जाप प्रारंभ किया और जाप पूर्ण होते-होते गंगा ने मेरी माला लौटा दी। यह मेरे लिए अलौकिक चमत्कार से कम न था। और ऐसी घटनाए क्या कभी भूली जा सकती हैं ?

indiBooks : हिन्दी साहित्य का भविष्य आपकी नजर में कैसा है ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : आज हिन्दी का स्थान विश्व की तीन प्रमुख भाषाओ में एक है ऐसे में हिन्दी साहित्य को भी अनुवादों के जरिए विश्व-मंच पर स्थापित करना होगा साहित्य के अतिरिक्त अन्य विषयों को भी हिन्दी माध्यम से प्रस्तुत करने से ही लोगों की अभिरूचि हिन्दी साहित्य में भी बढ़ेगी। इण्टरनेट ने इस दिशा में बड़ा काम किया है और निरंतर सक्रिय है। मैं नये लेखकों से यह भी अपेक्षा करूंगा कि वे वरिष्ठ साहित्यकारों के साहित्य का निरंतर अध्ययन करते रहें जिससे उनको अपने लेखन की दिशा तय करने में भी सुविधा होगी। कुल मिलाकर हिंदी साहित्य का भविष्य उल्लासपूर्ण ही है।

indiBooks : आप अपने पाठकों से क्या कहना चाहेंगे ?
डॉ0 चन्द्रभाल सुकुमार : बच्चन जी ने कहा है कि सिफारिश से न तो प्रेमी मिलते हैं और न पाठक दिनकर जी ने भी कहा था कि लेखक का काम अपनी मेज से शुरू होकर पाठक की मेज पर समाप्त होता है। ऐसी स्थिति में मैं पाठकों से यह स्नेहिल अपेक्षा तो करना ही चाहूंगा कि वे अपनी तिक्त-मधुर प्रतिक्रियाओं से लेखकों को सदैव अवगत कराते रहें जिससे लेखकों को भी अपनी त्रुटियों का पता चले और यह भी पता चले कि आज का पाठक वास्तव में क्या पढ़ना चाहता है। साथ ही साथ मैं indiBooks को भी इस साहित्यिक अवदान के लिए विशेष साधुवाद देता हूं। यह आत्मीयता ऐसे ही बनी रहनी चाहिए।



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