आज हम आपकी मुलाकात ब्लॉग दुनिया और साहित्य की दुनिया में अपनी अलग ही पहचान लिए साहित्यकार एवं ब्लॉगर राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही' जी से। ब्लॉग के माध्यम से दुनिया को राह दिखाने वाले राही जी वर्तमान में कपूरथला जिले में निवास कर रहें है। उन्होनें हमारे साथ कुछ दिनों पहले प्रकाशित उनकी एक पुस्तक "ढाई कदम" के बारे में और जीवन के कुछ खट्टे-मीठे अनुभवों को साझा किया।

indiBooks : राकेश जी, हम आपका संक्षिप्त परिचय आपके शब्दों में जानना चाहते है?
Rakesh Kumar Srivastava : सत्याग्रह का पहला सफल प्रयोग गांधी जी ने मोतिहारी से किया जो मेरा जन्मस्थली है। शिक्षा मोतिहारी एवं मुजफ्फरपुर में हुई। सन् 1992 में मैं भारतीय रेलवे के रेल डिब्बा कारखाना, कपूरथला (पंजाब) की सेवा में नियुक्त हुआ और आज सीनियर सेक्शन इंजिनियर के पद पर कार्यरत हूँ।

indiBooks :  “ढाई कदम” आपका पहला उपन्यास है, इसके बारे में कुछ बताएं। 
Rakesh Kumar Srivastava : मेरा पहला उपन्यास स्त्री विमर्श पर आधारित है। स्त्रियों का जीवन संघर्षमय है और इसी संघर्ष के बीच खुद को स्थापित करने की जद्दोजहद करती मेरी नायिका “शिवांगी” एवं उसके परिवेश में आए अन्य पात्रों की कहानी, कुछ आपबीती और कुछ जगबीती पर आधारित है।

indiBooks : ‘ढ़ाई कदम’के लिए मुख्य पात्र की भूमिका के लिए आपको प्रेरणा कहां से मिली? क्या आप मुख्य पात्र के बारे में कुछ जानकारी देना चाहेंगे?
Rakesh Kumar Srivastava : बिहार प्रदेश के लड़कों में आई.ए.एस. बनने की जुनून एवं संघर्ष के किस्से तो सभी जानते हैं, परन्तु इस राह पर चलने वाली लड़कियों के साथ क्या बीतती है? उसके घरेलू एवं सामाजिक स्तर के चुनौतियों के साथ संघर्ष, अपनी अस्मिता की शुचिता बरकरार रखते हुए अपना जीवन गरिमामय तरीके से जीने की कहानी कहती है “ढाई कदम”।

indiBooks : पुस्तक प्रकाशन के लिए विचार कैसे बना?
Rakesh Kumar Srivastava : जैसा की आप पहले से जानते हैं कि “ढाई कदम” मेरा प्रथम उपन्यास है और प्रत्येक लेखक की इच्छा होती है कि उसकी कृति जन-जन तक पहुँचे। इसके लिए पुस्तक प्रकाशन से अच्छा और कोई उत्तम माध्यम नहीं है।

indiBooks : राकेश जी, ‘ढाई कदम’ को आपने कितने समय में पूरा किया और सरकारी सेवा के साथ ‘ढाई कदम’ के लिए समय का प्रबंधन कैसे किया?
Rakesh Kumar Srivastava : मेरा मानना है कि उपन्यास लेखन, एक मातृत्व भाव को अनुभव करने जैसा है। इसको लिखने में करीब तीन महीने लगे और इसके प्रकाशन तक मुझे लगभग नौ महीने लगे। मनपसंद कार्य और परिवार का सहयोग हो तो समय का प्रबंधन आसान हो जाता है। प्रकृति के गोद में बसा मेरा रेल डिब्बा कारखाना में बसे लोगों की जीवनशैली, महानगर के भाग-दौड़ की ज़िन्दगी से भिन्न है। अतः सरकारी सेवा के बाद लिखने के लिए मुझे पर्याप्त समय मिलता है।

indiBooks : ‘ढाई कदम’ को लिखने के दौरान आपको किसका सबसे ज्यादा सहयोग प्राप्त हुआ? आप चाहें तो यहां पर उनका शुक्रिया कर सकते है?
Rakesh Kumar Srivastava : बिना पारिवारिक सहयोग के आप घर पर बैठ कर लेखन नहीं कर सकते और इसके लिए मैं अपनी पत्नी काजल किरण के सहयोग का कायल हूँ, जिन्होंने इस उपन्यास के प्रत्येक अध्याय के पूर्ण होने के बाद इसे पढ़ कर अपने सुझाव एवं स्वीकृति देकर अगले अध्याय को लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया। उपन्यास पूर्ण होने के बाद सम्पादन का कार्य सबसे दुरूह होता है और इस कार्य में सहयोग के लिए मैं अपनी पत्नी श्रीमती काजल किरण, मेरे कार्यालय की हिंदी विभाग की राजभाषा अधीक्षक श्रीमती कुलजिंदर कौर, मेरे सहयोगी मित्र श्री संदीप कुमार, श्री गिरधर गोपाल अरोड़ा और लेखक एवं सहयोगी मित्र भाई केदार नाथ ‘शब्द मसीहा’ जी के साथ साथ प्राची डिजिटल प्रकाशन का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ।

indiBooks : पहली पुस्तक प्रकाशित कराने में क्या आपको किसी परेशानी का सामना करना पड़ा? यदि हां तो वो परेशानी क्या रहीं? 
Rakesh Kumar Srivastava : प्रकाशन के क्षेत्र में नए लेखकों की अनुभवहीनता के कारण परेशानी तो होती ही है। सबसे बड़ी परेशानी तो प्रकाशक के चुनाव में है। कोई भी प्रतिष्ठित प्रकाशक नए लेखकों के कृति को छापने का दुःसाहस नहीं करता और जो करते भी है, वो लेखकों से लाखों रूपए का भुगतान चाहते हैं।

indiBooks : आप अपने जीवन में किसे अपना आदर्श मानते है और क्यों?
Rakesh Kumar Srivastava : मैं अपने पिता जी स्वर्गीय प्रोफेसर सुरेन्द्र प्रसाद वर्मा जी को अपना आदर्श मानता हूँ। आज मेरा जो व्यक्तित्व है सब उन्हीं के आचरणों के  प्रेरणा से है।

indiBooks : अब तक प्रकाशकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?
Rakesh Kumar Srivastava : खट्टे-मीठे।

indiBooks : आपकी पसंद की लेखन विधा कौन सी है, जिसमें आप सबसे ज्यादा लेखन करते हैं?
Rakesh Kumar Srivastava : ऐसे तो मैं सबसे ज्यादा कविता एवं यात्रा-वृतांत लिखता हूँ, परन्तु उपन्यास लेखन को अपने लिए एक चुनौती मानता हूँ।

indiBooks : क्या आपका कोई Ideal लेखक या लेखिका  है? जिनसे आपको प्रेरणा मिलती है। यदि हां, तो आप उनसे प्रेरणा कैसे प्राप्त करते है?
Rakesh Kumar Srivastava : लेखन क्षेत्र में मैं एक विद्यार्थी  हूँ और हिंदी के सभी रचनाकार मेरे गुरु हैं। मैं किसी व्यक्ति विशेष लेखक से नहीं अपितु सभी लेखकों से प्रेरणा लेता हूँ, परन्तु लेखन की अपनी शैली पर किसी को हावी नहीं होने देता। उपन्यास ज्यादा पढ़ता हूँ उनमें प्रमुख हैं मुंशी प्रेमचंद, श्री शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय, श्री भागवती चरण वर्मा, श्री नरेन्द्र कोहली और अन्य सभी नए-पुराने लेखक जो भारतीय संस्कृति से सरोकार रखते हैं।

indiBooks : राकेश जी, क्या आपको जीवन में ऐसी उपलब्धि प्राप्त हुई है, जिसने आपके परिवार और मित्रों को अपार खुशियों से भर दिया हो।
Rakesh Kumar Srivastava : भारत सरकार के अनुबंध से एक साल के लिए यू.ए.ई में विदेश प्रवास था और मजेदार बात यह थी कि यू.के. में हाई-स्पीड रेलवे के लिए डिजाईन करना था, तकनिकी सहयोग भारत से ली गई और कार्य स्थल यू.ए.ई में थी।

indiBooks : राकेश जी, आपके जीवन में कोई ऐसी प्रेरक घटना घटित हुई है, जिसे आप कभी भूलना नहीं चाहेंगे? लेकिन उसे आप हमारे पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे।
Rakesh Kumar Srivastava : उपन्यास प्रकाशन के दौरान आगरा एक्सप्रेस-वे पर भयंकर दुर्घटना में मेरे कार के परखच्चे उड़ गए, परन्तु कार में सवार हम चारों को मामूली खरोंच के अलावा कुछ भी नहीं हुआ। चंद सेकेंडों के लिए मौत से आमना-सामना हुआ, उसके बाद क्या हुआ इसका एहसास तक नहीं हुआ। आँखें खुलीं तो हमलोग अपने-अपने पैरों पर खड़े थे। वहाँ का मंजर देख कर ईश्वरीय कृपा की अनुभूति हो रही थी।

indiBooks : रेलवे द्वारा हिन्दी भाषा के प्रोत्साहन के लिए कई प्रयास किये जाते है। क्या आपको भी आपके विभाग द्वारा हिन्दी साहित्य की सेवा के लिए प्रोत्साहन प्राप्त होता है?  
Rakesh Kumar Srivastava : पिछले कई वर्षों से हिंदी साहित्य की सेवा के लिए मुझे प्रोत्साहन मिलता रहा है और विशेष कर मेरी सरकारी संस्था के राजभाषा विभाग द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘अरुणोदय’ में मेरी कहानी, कविता और यात्रा वृतांत छपती रहती हैं।

indiBooks : आप ब्लॉग लेखन भी करते है, ब्लॉगिंग के लिए समय कैसे निकालते है?
Rakesh Kumar Srivastava : प्रत्येक दिन से कुछ घंटे लेखन के लिए समय निकाल ही लेता हूँ।

indiBooks :हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के उत्थान पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
Rakesh Kumar Srivastava : जब तक भारतीय संस्कृति रहेगी, हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य का उत्थान होता रहेगा।

indiBooks : आप अपने पाठकों से क्या कहना चाहेंगे।
Rakesh Kumar Srivastava : हिंदी लिखें और पढ़ें और कम से कम हिंदी में हस्ताक्षर अवश्य करें।





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