‘पंचरतन’ के संपादक लक्ष्मण सिंह त्यागी जी से एक छोटी सी मुलाकात

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पिछले दिनों ही साझा संकलन ‘पंचरतन‘ प्रकाशित हुआ है। जिसका संपादन लक्ष्मण सिंह त्यागी ‘रितेश’ जी ने किया है, से indiBooks टीम ने साझात्कार किया गया। लक्ष्मण जी का साझात्कार पूर्व में भी प्रकाशित हो चुका है, लेकिन यहाँ हमने उनके नये साझा संकलन को लेकर पुन: साक्षात्कार किया है। आशा करते हैं कि पाठकों को उनके संपादन अनुभव से बहुत कुछ सीखने काे प्राप्त होगा। लक्ष्मण जी ने एक ही वर्ष में कई पुस्तकें प्रकाशित की है, जिनमें कुछ पुस्तकें अमेजन पर बेस्ट सेलर भी रहीं है। आपके लिए पेश हैं लक्ष्मण जी से वार्ता के प्रमुख अंश-

लक्ष्मण सिंह त्यागी जी के पूर्व में प्रकाशित साक्षात्कार को पढ़ें।

indiBooks : लक्ष्मण जी, नमस्कार। हम आपका शुक्रिया करना चाहते हैं क्योंकि आपने हमें साक्षात्कार के लिए अपना कीमती समय दिया। यदि आप अपने शब्दों में आप अपना परिचय देंगें, तो सम्मानित पाठक आपके बारे मे ज्यादा जान पायेंगे?

लक्ष्मण सिंह त्यागी : नमस्कार जी! आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो मुझे अपनी बात रखने का मौका दिया।
मेरा नाम लक्ष्मण सिंह त्यागी ‘ रीतेश’ है, मैं मूल रूप से गाँव बदरिका धौलपुर राजस्थान से हूँ वर्तमान में पन्ना मध्यप्रदेश में निवासरत हूँ और यहीं शिक्षक के पद पर शासकीय उत्कृष्ट उ मा वि पन्ना म प्र में कार्यरत हूँ।

indiBooks : लक्ष्मण जी, आपकी पुस्तकों की सफलता के लिए आपको बधाईयाँ। आप एक ही वर्ष में कई पुस्तकें लेकर आए और उन्हें सफल भी किया, इसके बारे में क्या कहना चाहेंगे?

लक्ष्मण सिंह त्यागी : आपका बहुत धन्यवाद! यह आपने ठीक प्रश्न किया कि एक ही वर्ष में लगातार कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, यही बात मुझसे अनेक लोग बोल चुके हैं तो मैं यहाँ स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं लगभग तेरह वर्ष का था तब से लेखन कर रहा हूँ करीब बीस वर्ष हो चुके हैं।

कृपया पाठक मित्र ये ना समझें कि मैं सब कुछ अभी अभी लिखकर प्रकाशित कर रहा हूँ। यह बीस वर्षों की साधना है। हाँ इस बात से सहमत हूँ कि इसी वर्ष पहली पुस्तक प्रकाशित हुई और अभी तक संख्या आठ पहुँच चुकी है। [ इनमें से कुछ पुस्तकें साझा संग्रह भी हैं ] रही सफलता की बात तो मेरा ऐसा मानना है कि कोई पुस्तक सफल है या नहीं इसका आंकलन कई वर्षों बाद हो पाता है। मैं पुस्तक की बिक्री या खरीददारी के संख्यात्मक आंकड़ों को सफलता का पैमाना नही मानता।

indiBooks : पिछले दिनों ही आपका साझा संग्रह ‘पंचरतन’ प्रकाशित हुआ है, उसमें आपने संपादक का दायित्व निभाया है, कैसा अनुभव रहा?

लक्ष्मण सिंह त्यागी : यह मेरा पहला अनुभव था। बहुत ही सुखद और बहुत कुछ सीखने वाला अनुभव था। संपादक होना एक सपने जैसा था मैं खुश किस्मत हूँ कि यह सपना भी पूरा हुआ।

indiBooks : लक्ष्मण जी, आपकी पुस्तके अमेजन पर बेस्ट सेलर भी रहीं है और इसके अलावा आपकी पुस्तकें पाठकों द्वारा बहुत ज्यादा पसंद की जाती रही हैं, इसके बारे में आपकी क्या राय है?

लक्ष्मण सिंह त्यागी : मुझे चाहने वाले , प्यार देने वाले यहाँ बहुत हैं। वे सभी मेरा बहुत उत्साह वर्धन करते हैं, उन सभी को नमन। मेरी कोशिश बस इतनी सी रहती है कि लिखा वही जाये जो वर्तमान की मांग है दूसरा जो लोगों के करीब है।

पढते हुए ऐसा लगना चाहिए कि ये तो मेरा दर्द या मेरी समस्या पर ही लिखा गया है। तो लोग भी पसंद करते हैं और खरीदते भी बहुत हैं। मैं आपके माध्यम से अपने सभी पाठक मित्रों को धन्यवाद देना चाहता हूँ और आप सभी से आगे भी सहयोगात्मक अपेक्षा रखता हूँ।

indiBooks : लक्ष्मण जी, एक लेखक से साझा संग्रह का संपादक बनने का विचार कैसे बना?

लक्ष्मण सिंह त्यागी : कुछ मित्रों के अनुरोध पर मैंने ये सब सोचा मगर कहीं ना कहीं मेरा भी ऐसा विचार था कि मैं संपादक की भूमिका निभाऊं। मुश्किलें आती हैं मगर उनके डर से खुद को सीमित रखना भी तो गलत है।

indiBooks : साझा संग्रह के संपादन के दौरान अन्य सहयोगियों का सहयोग कैसा रहा?

लक्ष्मण सिंह त्यागी : जैसा कि आपको पता है कि इस पुस्तक पंचरतन में मेरे अलावा चार सहयोगी और भी हैं। मुझे दिक्कत इसलिए भी नहीं आयी क्योंकि आप सभी मेरे पूर्व से मित्र थे।

इसके अलावा चारों ने मेरे साथ काफी मेहनत की। मुझे भरपूर सहयोग दिया। मैं पुनः अपने चारों साथी श्री राजेश कुमार गुप्त जी, श्री बृजमोहन त्यागी जी, श्री बृजेन्द्र सिंह नरवरिया जी एवं श्री राजेन्द्र नामदेव जी को बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहता हूँ। आशा है आप सभी का सहयोग इसी तरह बना रहेगा।

indiBooks : आप अपने अज़ीज शुभचिन्तकों, पाठकों और प्रशंसकों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?

लक्ष्मण सिंह त्यागी : मैं अपने मित्रों से यही कहना चाहता हूँ कि यदि आप पुस्तकों से मित्रता बनाये रखेंगे तो आप बहुत सी समस्याओं का हल ऐसे ही पा सकते हैं।

मेरी अभी तो शुरुआत है मुझे हर कदम पर आप सभी की बहुत आवश्यकता पडेगी, कृपया इसी तरह मेरा उत्साह बढाते रहें। ऐसा मैं सोचता हूँ कि मेहनत बेकार नहीं जाती जो आपको पसंद है उस क्षेत्र में लगातार मेहनत जारी रखें।

अंत में मैं अपने सभी मित्रों पाठकों शुभ चिन्तकों का बहुत बहुत धन्यवाद अदा करना चाहता हूँ और स्पेशल धन्यवाद प्रकाशक महोदय प्राची डिजिटल पब्लिकेशन को भी देना चाहूंगा जिनकी मेहनत ने मुझे पुनर्जीवित कर दिया।

About the Book

Shared anthology ‘Pancharatan’ is a unique confluence of five genres of Hindi literature and five creators. This book is undoubtedly the Pancharatna which includes gold, pearl, diamond, red and sapphire. Pancharatan contains five valuable genres of literature, including poetry, story (short story), essay, memoir and research paper.

prachi
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