एक प्रेम कविता ‘चन्द्री’ के लेखक डॉ. प्रदीप कुमार सुमनाक्षर जी के साथ एक साक्षात्कार

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पिछले दिनों हमने दिल्ली से कवि एवं शिक्षक डॉ. प्रदीप कुमार सुमनाक्षर से साक्षात्कार किया। अभी हाल ही में आपकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुई है, जिनपर भी हमने उनसे वार्ता की। स्वभाव से मिलनसार, मृदुभाषी एवं सहयोगी प्रवृत्ति के डा‍ॅ. सुमनाक्षर की अब तक दर्जन भर पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के प्रमुख अंश:

indiBooks : प्रदीप जी, हम आपका संक्षिप्त परिचय आपके शब्दों में जानना चाहते है?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : परिचय तो इतना ही है कि जितना अभी आप जानते है, अभी खुद मैं अपने परिचय को खोज रहा हूँ।

indiBooks : आपकी पहली पुस्तक कब प्रकाशित हुई थी? उस के बारे में कुछ बताएं?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : पहली पुस्तक 2016 में प्रकाशित हुई, “स्नेहा”। स्नेहा, प्रेम की कल्पनाओं की उड़ान है, प्रेम का दर्द है, जो पुरे ना हुए उन खवाबों, अभिलाषाओं की टीस है, जो पाठक के दिल में सीधे उतर जाती है।

indiBooks : पिछले दिनों आपकी दो पुस्तकें ‘चन्द्री’ एवं ‘ख्याल’ प्रकाशित हुई है, दोनों पुस्तकों के नाम अपने आप में विशेष हैं, क्या आप इनके बारे में जानकारी देना चाहेंगे? 
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : पुस्तकों के नाम मैं बहुत ही खोज बीन और सोच समझ कर ही रखता हूँ।

“चन्द्री” एक प्रेम कविता है जो चंदरी के प्रति मेरे प्यार के अधूरे खवाबों की दुनिया में विचरती है, जो वास्तविकता है और अधूरी है, हर अधूरी प्रेम कहानी की तरह।

“ख्याल” मेरे मन में प्यार, वफा, दर्द के प्रति उपजी संवेदनाये है जो प्यार के स्वरूप को सहज ही पाठको के मन को छूने की ताकत रखती है।

indiBooks : आपकी अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। क्या आप उनके बारे में हमारे पाठकों को जानकारी देना चाहेंगे?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : मेरी 8–9 पुस्तकें अभी तक प्रकाशित हो चुकी है और एक अभी आने वाली है। मेरी पुस्तकें “स्नेहा”, “तसव्वुर”, “दर्द पराया”, “ख्याल” सब प्रेम की पृष्ट भूमि पर लिखी प्रेम कवितायेँ है जो प्रेम के अनेको बिम्ब प्रस्तुत करती है। “मेरा वतन” देश प्रेम व देश की अनेको समस्याओ की और इशारा करती हुई काव्य संग्रह है! “तारीखें” मेरे जीवन की हर रोज की घटनाओं को दर्शाती हुई चाहते भरी कविताओं का संग्रह है। “पत्तियां” और “पंखुडियां” अपने नाम के अनुसार छोटी छोटी चार चार पंक्तियों की प्रेम रचनाये है, जो पढ़ने वालों को अपने अंदर समां लेती है।

indiBooks : प्रदीप जी, आपकी प्रकाशित पुस्तकों में सबसे ज्यादा पसंदीदा पुस्तक कौन सी है?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : बड़ा कठिन प्रश्न है, लेखक की दृष्टि से हर पुस्तक विशेष है फिर भी मेरा मानना है कि पहली पुस्तक ही किसी लेखक की सबसे पसंदीदा होगी! मेरी पहली पुस्तक “स्नेहा’ ही मुझे आज भी सबसे ज्यादा पसंद है, क्योंकि जो आनंद, ख़ुशी पहली पुस्तक के हाथों में आने पर मिलती है वो फिर कभी उतनी नही मिलती।

indiBooks : आपके मन में पुस्तक प्रकाशन के लिए विचार कब और कैसे आया?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : लिखते तो बहुत पहले से थे, परन्तु बस शौक के लिए लिखा और डायरी में बंद! फिर शादी हो गयी तो पत्नी चुपके-चुपके वो डायरी पढ़ती रहती, फिर एक रोज उसने कहा कि इन्हें छपवाते क्यूँ नहीं, कोई तो पढ़ेगा! बस यही से विचार आया कि चलो अपनी पुरानी दुनिया को फिर जिन्दा कर ले और बन गये कवि।

indiBooks : जब आप पुस्तक के लिए लेखन करते हैं, तो आपको सबसे ज्यादा किसका सहयोग प्राप्त होता है?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : मेरी पत्नी मोनिका का, सबसे पहले उसे ही सुनाता हूँ! वो ही पुस्तक में एडिटिंग का काम देखती है कमी पेशी कुछ रह गयी है तो बताती है!

indiBooks : लेखन के लिए आप कहां से प्रेरणा प्राप्त करते हैं?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : यादों से, प्रकृति से, संगीत से, समाज से!

indiBooks : लेखन के लिए आप समय प्रबंधन कैसे करते हैं?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : जी कोशिश करता हूँ कि रात्रि के कुछ घंटे कविता के लिए बचा कर रखूं!

indiBooks : आप अपने जीवन में किसे अपना आदर्श मानते है और क्यों?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : अपनी अध्यापिका डॉ शशि प्रभा सिंह, दिल्ली विश्विधालय, क्योंकि उन्होंने मेरे जीवन को एक नयी दिशा दी, जो मुझे आज भी राह पर चला रही है।

indiBooks : अब तक प्रकाशकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : अब किसी का नाम लेना उचित नही है। दो प्रकाशकों ने बड़ा रुलाया, एक प्रकाशक ने अभी भी उलझा कर रखा है, हाँ! प्राची डिजिटल पब्लिकेशन की सेवाओं और उनके स्वभाव से मैं बहुत प्रभावित हूँ, उन्होंने कार्य सही समय और गुणवत्ता के साथ कर के दिया।

indiBooks : आपकी पसंद की लेखन विद्या कौन सी है, जिसमें आप सबसे ज्यादा लेखन करते हैं?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : मैं छन्दमुक्त गीत, कवितायेँ और ग़ज़ल ही ज्यादा लिखता हूँ।

indiBooks : क्या आपका कोई Ideal लेखक या लेखिका है? जिनसे आपको प्रेरणा मिलती है। यदि हां, तो आप उनसे प्रेरणा कैसे प्राप्त करते है?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : मुझे आदरणीय नीरज जी की लेखनी, उनका सरल व्यक्तित्व और अंदाज बड़ा प्रभावित करता है। उनकी कई रचनायें मेरे मन में हमेशा चलती रहती है, उन्होंने हिंदी साहित्य के जिस शिखर को छुआ है वो सभी नव लेखकों के लिए आदर्श हैं, उनका लेखन व जीवन संघर्ष और उन्होंने जिस मुकाम को छुआ, वो  मुझे आगे बढ़ने के लिए हमेशा उर्जा प्रदान करते है।

indiBooks : क्या आपको जीवन में ऐसी उपलब्धि प्राप्त हुई है, जिसने आपके परिवार और मित्रों को अपार खुशियों से भर दिया हो?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : आज लेखन के माध्यम से अनेको मंचो पर राष्ट्रीय व अंतर्रराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए और पहचान बनी, अखबार रेडियो आदि में आने का अवसर मिला, विद्यावाचस्पति व विद्या विशारद की मानद उपाधि से समान्नित होने का अवसर प्राप्त हुआ, और अभी यात्रा जारी है।

indiBooks : प्रदीप जी, आपके जीवन में कोई ऐसी प्रेरक घटना घटित हुई है, जिसे आप कभी भूलना नहीं चाहेंगे? लेकिन उसे आप हमारे पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे।
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : कुछ बातें साझा हो ही नही पाती, बस इतना ही कि खुश रहों, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करो।

indiBooks : हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के उत्थान पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : जिस गति से हिंदी का प्रचार और प्रसार निजी स्तर पर हो रहा है उससे लगता है की हिंदी का भविष्य बड़ा उजला है। रोज हिंदी में कितना साहित्य जन्म ले रहा है! मगर मैं हिदी को उर्दू से अलग करने या देखने के पक्ष में नही हूँ। मुझे लगता है की हिंदी उर्दू अब बहनें नही, पति-पत्नी हो गयी है, जिन्हें अलग करना ना तो न्यायोचित है और ना तर्क संगत! ये पाप के सामान है।

indiBooks : आप अपने पाठकों से क्या कहना चाहेंगे?
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : नए लेखकों को भी पढ़े, सम्मान दें केवल बड़े लेखकों के नाम को ना पढ़े नव लेखनी को भी आदर दे, क्योंकि मैंने देखा है कि हमारे यहाँ पाठक किताब लेखक के नाम से ज्यादा पढ़ते है, वो दूसरों को पढ़ना ही नही चाहते।

indiBooks : आप नये लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?  
Dr. Pradeep Kumar Sumanakshar : अच्छा लिखना चाहते है तो अच्छा पढ़ें, जो विषय मन के सबसे ज्यादा करीब हो उस पर लिखें, हर विषय हर टॉपिक पर लिखने से बचे।

prachi

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