काव्य संग्रह ‘भावावेग’ के लेखक कुन्दन कमार जी के साथ एक साक्षात्कार

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काव्य संग्रह ‘भावावेग’ के लेखक कुन्दन जी पुस्तक पिछले दिनों ही प्रकाशित हुई है। जिसे पाठकों द्वारा बहुत ज्यादा पसंद किया गया और उनके लेखन को सराहा। न्यायिक सेवा में सेवारत सरल स्वभाव के कुन्दन जी हमने साक्षात्कार किया। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के प्रमुख अंश:

Indibooks : कुन्दन जी, हम आपका संक्षिप्त परिचय आपके शब्दों में जानना चाहते है?
Kundan Kumar : मेरा जन्म बिहार के मुंगेर जिला अंतर्गत असरगंज नामक कस्बे में दो भाई एवं एक बहन के बाद हुआ। मेरी उच्च विद्यालय तक की शिक्षा असरगंज में, तत्पश्चात मुंगेर जिला अंतरगत ही तारापुर तथा दिल्ली में संपन्न हुई। वर्तमान में मैं जिला व सत्र न्यायलय नौगांव, असम में न्यायिक कर्मचारी के तौर पर कार्यरत हूँ।

Indibooks : ‘भावावेग’ आपका पहला काव्य संग्रह है, इसके बारे में कुछ बताएं। 
Kundan Kumar : ‘भावावेग’ पुस्तक की समस्त कवितायें किसी न किसी रूप में ब्यक्ति के ब्यक्तित्व को दर्शाती है। इन कविताओं के माध्यम से मैंने लोगों को समझने का प्रयास किया है, उनका दंभ, उनकी बेचैनी, डर, प्रेम, घृणा इत्यादि जो भी ब्यक्तियों की दिनचर्या में आमतौर या खासतौर पर शामिल होते हैं। जिसे कि मैं अपनी भाषा में स्वयं को उस स्थान पर रखकर काब्यरूप देने का प्रयत्न किया है।

Indibooks : पुस्तक प्रकाशन के लिए विचार कैसे बना?
Kundan Kumar : किसी भी रचनाकार की एक ही इच्छा होती है कि उनकी रचनाएँ जन- जन तक पहुंचें, जो पत्रिकाओं के माध्यम से मेरे लिए संभव भी था। परन्तु मैं चाहता था कि सभी रचनाएँ यदि एक साथ पाठकों तक पहुंचती है तो वे मेरे लेखन शैली को और अच्छे से समझकर अपनी प्रतिक्रिया से मेरा ध्यान उन बिंदुओं पर केंद्रित कराने में सक्षम होंगे जो मेरी लेखनशैली को और प्रगाढ़ बनाने में सहायक होगी। इसके लिए कविताओं को संकलित कर पुस्तकरूप प्रदान करना ही एकमात्र तरीका शेष था।

Indibooks : कुन्दन जी, आपकी रचनाएं कई पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होती रहती हैं, आप कैसे समय प्रबंधन करते हैं? 
Kundan Kumar : न्यायिक कर्मचारी होने के कारण कार्यालय का समय निर्धारित है तथा सप्ताहांत में कम से कम एक दिन का तो अवकाश प्राप्त हो ही जाता है, जो लेखन में मेरे लिए काफी मददगार होती है।

Indibooks : ‘भावावेग’ काव्य संग्रह को लिखने के दौरान आपको किसका सबसे ज्यादा सहयोग प्राप्त हुआ? आप चाहें तो यहां पर उनका शुक्रिया कर सकते है? 
Kundan Kumar : ‘भावावेग’ काब्य संग्रह लिखने के दौरान मेरे मित्रों एवं मेरी बड़ी बहन का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ है। जिन्होंने मेरी रचनाओं को पढ़कर मुझे सदा प्रोत्साहन प्रदान करते रहे हैं। साथ ही मैं साहित्यसुधा का भी ह्रदय से आभार प्रकट करता हूँ जिसने मेरी कविताओं को सदा अपने सम्मानीय पत्रिका में स्थान देकर लेखन के लिए  प्रोत्साहित करती रही।

Indibooks : लेखन के लिए आप कहां से प्रेरणा प्राप्त करते हैं?
Kundan Kumar : व्यक्तियों तथा उनके व्यक्तित्व से मुझे सबसे अधिक प्रेरणा प्राप्त होती है साथ ही मुझे सम्मानीय व्यक्तियों के साक्षात्कार पढ़ने, सुनने तथा देखने में रूचि है, जिनमें उनके मुखारविंद से कुछ ऐसी बातें – विषय की चर्चा हो जाती है जो मेरे लिए प्रेरणा का काम करती है।

Indibooks : पहली पुस्तक प्रकाशित कराने में क्या आपको किसी परेशानी का सामना करना पड़ा? यदि हां तो वो परेशानी क्या रहीं? 
Kundan Kumar : यूँ कहें कि पुस्तक स्वयं ही प्रकाशन के लिए तैयार बैठी थी, इसके लिए मुझे किसी प्रकार का कोई भागदौड़ नहीं करना पड़ा, बस मुझे उसका थोड़ा सा सहयोग करना था। पुस्तक प्रकाशन में मैं अहम् भूमिका अक्षय गौरव पत्रिका का भी समझता हूँ जिन्होंने मेरी कविता को अपने पत्रिका में स्थान दिया तथा मेरा संपर्क प्राची डिजिटल पब्लिकेशन से हो सका। तत्पश्चात प्राची डिजिटल पब्लिकेशन का सहयोग ही इस प्रकार का था कि मेरी रही सही चिंताएं भी स्वतः ही समाप्त हो गयी।

Indibooks : आप अपने जीवन में किसे अपना आदर्श मानते है और क्यों?
Kundan Kumar : अब तक तो कोई भी एक ब्यक्ति मेरे ह्रदय के करीब नहीं पहुँच पाए हैं जिनका कि मैं अपने जीवन में अनुसरण करूं।

Indibooks : अब तक प्रकाशकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?
Kundan Kumar : अत्यंत ही हृदयस्पर्शी। सौभाग्यवश मेरा संपर्क जिन किसी भी प्रकाशकों से हुआ है उन सबों का प्रेम मेरे प्रति छोटे भाई के सामान रहा तथा उन्होंने मेरी रचनाओं को सराहते हुए मेरे ह्रदय में हिंदी साहित्य के लिए सतत समर्पण का भाव उजागर किया है।

Indibooks : आपकी पसंद की लेखन विद्या कौन सी है, जिसमें आप सबसे ज्यादा लेखन करते हैं?
Kundan Kumar : व्यक्तित्व चित्रण व प्रेम।

Indibooks : क्या आपका कोई Ideal लेखक या लेखिका  है? जिनसे आपको प्रेरणा मिलती है। यदि हां, तो आप उनसे प्रेरणा कैसे प्राप्त करते है?
Kundan Kumar : मैं समस्त रचनकारों का आदर करता हूँ। उनकी विभिन्न विधाओं में रची गयी रचनाओं को अधिक से अधिक अध्ययन करना चाहता हूँ तथा यथासंभव करता भी हूँ, जिनसे मुझे लेखनशैली सुदृढ़ व स्पष्ट करने का मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

Indibooks : कुन्दन जी, क्या आपको जीवन में ऐसी उपलब्धि प्राप्त हुई है, जिसने आपके परिवार और मित्रों को अपार खुशियों से भर दिया हो।
Kundan Kumar : इसके लिए मैं प्रयासरत हूँ।

Indibooks : आपके जीवन में कोई ऐसी प्रेरक घटना घटित हुई है, जिसे आप कभी भूलना नहीं चाहेंगे? लेकिन उसे आप हमारे पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे।
Kundan Kumar : इस प्रकार की कोई घटना तो मुझे स्मरण नहीं है जो मेरे जीवन को किसी प्रेरणा से सराबोर कर दिया हो।

Indibooks : हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के उत्थान पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
Kundan Kumar : हिंदी को अभी बहुत लम्बी दुरी तय करनी है। जब तक वे लोग जो यह कहकर स्वयं को गौरवान्वित करते रहेंगे कि ‘मुझे हिंदी अच्छे से नहीं आती’ तथा हिन्दीभाषी जबतक स्वयं को हीनता की दृष्टि से देखेंगे तबतक हिंदी का कल्याण संभव नहीं है। आज हिंदी भारत के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित होकर रह गयी है तथा अहिन्दी भाषी क्षेत्र के लोग हिंदीभाषी को अनपढ़ समझने से भी पीछे नहीं हैं। हिंदी के उत्थान के लिए सबसे पहले तो हमें अपनी भाषा पर गर्व करना सीखना होगा, साथ ही लेखनशैली में भी हिंदी के शब्दों की ओर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। साहित्यसृजन के दौरान हमें जहाँ तक संभव हो सके अंग्रेजी के ‘वे शब्द तथा उन उपकरणों के नाम जिसका मूल अंग्रेजी ही है तथा जिनका उपयोग हिंदी में करने से आमजनों को अर्थ ही समझ न आये, ऐसे शब्दों के अतिरिक्त’ अनुपयोगी शब्दों से सदा दुरी बनाने की कोशिश करनी चाहिए। हिंदी तथा उर्दू समकक्षी भाषाएँ तथा दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरी हैं परन्तु, मैंने बहुत से ऐसे रचनाकारों की रचनाएँ पढ़ी है जो स्वयं को हिंदी साहित्यकार की श्रेणी में तो रखते हैं परन्तु अपनी रचनाओं में उर्दू का उपयोग भरपूर कर गौरव का अनुभव करते हैं।

हिंदी साहित्य जगत  में आज भी हिंदी साहित्य की कमी है। परन्तु, हमें हिंदी उत्थान के लिए निरंतर हिंदी की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए रुचिपूर्ण साहित्य निर्माण के प्रति समर्पित होना होगा तभी हिंदी को विश्वपटल पर स्थापित की जा सकती है। परन्तु, उनके समर्पण को भी नहीं भूलना चाहिए जो सतत हिंदी के सेवार्थ भारत तथा विश्व के कई स्थानों पर विभिन्न चरणों में काब्य गोष्ठी तथा साहित्य चर्चा का आयोजन करते रहते हैं।

Indibooks : आप अपने पाठकों से क्या कहना चाहेंगे।
Kundan Kumar : मैं अपने पाठकों से यही कहना चाहता हूँ कि वे मेरी रचनाओं का अवलोकन कर अपने विचारों को निःसंकोच मुझ तक प्रेषित कर मेरी लेखन को उत्कृष्ट करने में मदद करें।

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prachi

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