कहानी संग्रह ‘सवाल दर सवाल’ के लेखक अरविन्द गुप्ता जी से साक्षात्कार

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पिछले दिनों ही प्रकाशित पुस्तक “सवाल दर सवाल” के लेखक अरविन्द गुप्त जी से indiBooks द्वारा एक साक्षात्कार किया गया। वर्तमान में अरविन्द जी राष्ट्रीयकृत बैंक में प्रबंधन-सेवा के बाद अवकाश प्राप्त हैं। अरविन्द जी के पूर्व में भी अन्य दो संग्रह प्रकाशित हो चुकें है, जिनमें दो ट्रेडिशनल पब्लिशिंग के अर्न्तगत प्रकाशित पुस्तके है और पिछले दिनों प्रकाशित पुस्तक ‘सवाल दर सवाल’ सेल्फ पब्लिशिंग के अर्न्तगत प्रकाशित है। पेश हैं अरविन्द जी से साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश-

indiBooks : अरविंद जी, आप किसी पहचान के मोहताज नहीं है, लेकिन आप अपना परिचय अपने शब्दों में दें तो हमारे पाठक आपके बारे में ज्यादा जान पाएंगे?
Arvind Gupta Ji : मैं 1964-65 से कवितायें लिखने लगा था, 1966-67 से कहानियां। मेरी पहली कविता ‘ज्वालामुखी’ ‘स्वाधीनता’ में स्वीकृत हुई थी। उसके बाद में कुछ पत्रिकाओं में कवितायेँ आईं। कॉलेज में ‘सदल साहित्य परिषद’ की सर्वश्रेष्ठ कहानी थी ‘कल से कल तक’। फिर ‘वाम-2’ में कहानी आयी ‘नया पात्र’। जिसकी काफी अधिक चर्चा हुई। फिर तो ‘पुरुष’, ‘युवा लेखन’, ‘उत्तरार्ध’, ‘लहर’, ‘साहित्य निर्झर’, ‘बीज’, ‘प्रस्ताव’, ‘कथन’ आदि लघु साहित्यिक पत्रिकाओं में कहानियां आने लगीं। मैं व्यावसायिक पत्रिकाओं जैसे ‘सारिका’, ‘धर्मयुग’, ‘हिंदुस्तान’, ‘कादम्बिनी’ आदि में लिखता नहीं था। 1990 में मेरा पहला कहानी संग्रह ‘देहरी के पार’ ‘यात्री प्रकाशन’ दिल्ली से आया। फिर काफी समय बाद ‘आयाम प्रकाशन’, प्रयागराज से दूसरा संग्रह ‘मोनालिसा का सपना’ आया और अब यह ‘प्राची डिजिटल पब्लिकेशन’ से तीसरा संग्रह ‘सवाल दर सवाल’।

indiBooks : आपकी पहली पुस्तक कब प्रकाशित हुई थी? उस के बारे में कुछ बताएं?
Arvind Gupta Ji : जैसा कि मैंने ऊपर बताया मेरी पहली पुस्तक यानी कहानी संग्रह ‘देहरी के पार’ ‘यात्री प्रकाशन’, दिल्ली से 1190 में आया। मैं स्वयं के प्रति कभी रतिग्रस्त नहीं रहा बल्कि बिल्कुल निर्लिप्त रहा करता था। यह संग्रह मित्रवर अरुण प्रकाश जी के सौजन्य से प्रकाशित हुआ, जो अब नहीं रहे।

indiBooks : पिछले दिनों आपकी पुस्तक ‘सवाल दर सवाल’ प्रकाशित हुई है, क्या आप इसके बारे में जानकारी देना चाहेंगे?
Arvind Gupta Ji : जैसा कि मैंने ऊपर बताया मेरा पहला कहानी संग्रह ‘देहरी के पार’ 1990 में आया था। अब 2020 चल रहा है। तो उसमें से कुछ खास चर्चित कहानियों को लिया और दूसरे संग्रह से कुछ कहानियों को लेकर यह तीसरा संग्रह ‘सवाल दर सवाल’ बन पाया। वैसे तो एक लेखक के लिए सारी रचनाएँ महत्वपूर्ण ही होती हैं, फिर भी पाठकीय प्रतिक्रिया और समीक्षकों के विचार को देखकर कुछ रचनाओं को चुनना पड़ता है।

indiBooks : आपकी अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। क्या आप उनके बारे में हमारे पाठकों को जानकारी देना चाहेंगे?
Arvind Gupta Ji : मैंने बताया कि अब तक मेरी तीन ही संग्रह आये हैं : 1. ‘देहरी के पार’, 2. ‘मोनालिसा का सपना’, 3. ‘सवाल दर सवाल’। मैं ज्यादा लिख नहीं पाता। विचार तो उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। फिर छपने की भी समस्या है—कहाँ भेजें, कहाँ छपें। अनेक कहानियां पड़ी हैं। उपन्यास भी अधूरा पड़ा है। जीवन बड़ा सूना-सूना-सा है। बड़ा ही जटिल है संघर्षमय जीवन जीना। अनेक तरह की गुटबंदियां, छल-छद्म, भाई-भतीजावाद, जातिवाद जैसे जहर हैं समाज और साहित्य में।

indiBooks : आपकी प्रकाशित पुस्तकों में सबसे ज्यादा पसंदीदा पुस्तक कौन सी है?
Arvind Gupta Ji : मैंने बताया है मेरे अब तक तीन ही कहानी संग्रह आये हैं। अब तीनों में चुनाव करना बड़ा मुश्किल कार्य है। फिर भी मुझे लगता है कि पहला ही संग्रह ज्यादा पसंदीदा है, क्योंकि उसे प्रकाशक ने छापा था बिना मुझसे पैसे लिए और रॉयल्टी भी देता रहा। अब यह सब मुश्किल-सा लगता है। दूसरा संग्रह मैंने खुद ही छापा ‘आयाम’ के बैनर तले। दरअसल मैं डेहरी ऑन सोन से ‘आयाम’ निकालता था जिसके 4 अंक ही निकल पाए थे लेकिन काफी चर्चित रहे थे देश भर में।

indiBooks : आपके मन में पुस्तक प्रकाशन के लिए विचार कब और कैसे आया?
Arvind Gupta Ji : लिखने का मतलब है छपना और जब चीजें कुछ एकत्र हो जाएँ तब पुस्तक रूप में आना, क्योंकि पत्रिकाएं अधिक दिनों तक संभल नहीं पातीं; पुस्तकें तो फिर भी संभल जाती हैं।

indiBooks : जब आप पुस्तक के लिए लेखन करते हैं, तो आपको सबसे ज्यादा किसका सहयोग प्राप्त होता है?
Arvind Gupta Ji : मैं तो खुद ही लैपटॉप पर कम्पोज करता हूँ समय निकालकर और कौन है- आगे नाथ न पीछे पगहा।

indiBooks : लेखन के लिए आप कहां से प्रेरणा प्राप्त करते हैं?
Arvind Gupta Ji : लेखन के लिए प्रेरणा तो जीवन से बढ़कर और क्या हो सकता है। मैं तो जीवन के दुःख-दर्दों की ही अभिव्यक्ति करता हूँ- खासकर पीड़ित मानवता के दुःख-दर्दों की अभिव्यक्ति। मुझे गरीब, मजदूर, किसान, निम्न मध्यम वर्ग, दलित और महिला- इन सबों के दुःख-दर्द ज्यादा प्रताड़ित करते हैं।

indiBooks : लेखन के लिए आप समय प्रबंधन कैसे करते हैं?
Arvind Gupta Ji : पहले यह बड़ा दुरूह कार्य था। जब तक मैं स्नातक के बाद घर पर था—बेकार था—लोगों के घर जाकर ट्यूशनें पढ़ाया करता था। तब किसी तरह रात के वक्त समय निकाल कर लालटेन की रोशनी में मच्छरदानी के अंदर कहानियां लिखा करता था। फिर जब स्नातकोत्तर की शिक्षा के लिए मगध विश्वविद्यालय गया तो क्लास के कार्य करते हुए, प्रगतिशील जनवादी विचार मंच का गठन कार्य करते हुए, शोषित मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का गठन कार्य करते हुए भी समय निकल कर कहानियां लिख लेता था। उसके बाद नौकरी की तलाश में अचानक बैंक में नौकरी करनी पड़ी। तब भी दिनभर खटने के बाद रात के वक्त समय निकालकर थके-हारे कहानियां लिख लेता था। तब लघु-पत्रिकाएं कहानियां मांगती थीं। अब वैसा नहीं है।

indiBooks : आप अपने जीवन में किसे अपना आदर्श मानते हैं और क्यों?
Arvind Gupta Ji : जीवन के आदर्श तो विचार ही होते हैं। मैं भौतिकी का छात्र रहा हूँ। जाहिर है अल्बर्ट आइंस्टाइन, बर्ट्रेंड रसेल, स्टीफन होकिंग आदि और दर्शन के मामले में कार्ल मार्क्स मेरे आदर्श हो सकते हैं। साहित्य में गोर्की, चेखव, रवि बाबू, शरतचंद, प्रेमचंद, निराला, रेणु, नागार्जुन, मुक्तिबोध, महाश्वेता देवी आदि हो सकते हैं।

indiBooks : अब तक प्रकाशकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?
Arvind Gupta Ji : प्रकाशक तो मुझे अब तक दो ही मिले। पहला ‘यात्री प्रकाशन’ और दूसरा ‘प्राची डिजिटल पब्लिकेशन’। बाकी ‘आयाम’ प्रकाशन तो मेरा अपना ही है। ‘यात्री प्रकाशन’ ने किताब छापने के लिए मुझसे कोई पैसे नहीं लिए और 15% रोयल्टी देता रहा। अब ऐसा नहीं है, अब सेल्फ पब्लिशिंग योजना चल निकली है प्रकाशकों द्वारा।

indiBooks : आपकी पसंद की लेखन विद्या कौन सी है, जिसमें आप सबसे ज्यादा लेखन करते हैं?
Arvind Gupta Ji : बस मैं तो कहानियां ही लिखता हूँ। दो-तीन उपन्यास अधूरे पड़े हैं समयाभाव में। कभी-कभी कवितायेँ भी लिख लेता हूँ।

indiBooks : क्या आपका कोई Ideal लेखक या लेखिका है? जिनसे आपको प्रेरणा मिलती है। यदि हां, तो आप उनसे प्रेरणा कैसे प्राप्त करते है?
Arvind Gupta Ji : जहाँ तक प्रेरणा का सवाल है मुझे प्रेरणा जीवन से ही मिलती है—जीवन के विविध आयामों से। वैसे पसंद की बात की जाय तो मुझे चेखव, गोर्की, लियो तोल्सतोय, लू शुन, रवि बाबू, शरतचंद, प्रेमचंद, यशपाल, निराला, मुक्तिबोध, रेणु, नागार्जुन, महाश्वेता देवी आदि रहे हैं।

indiBooks : क्या आपको जीवन में ऐसी उपलब्धि प्राप्त हुई है, जिसने आपके परिवार और मित्रों को अपार खुशियों से भर दिया हो?
Arvind Gupta Ji : ऐसी कोई उपलब्धि मेरे जीवन में कोई खास नहीं रही है। मेरा जीवन बड़ा ही संघर्षमय रहा है। आज भी अकेले संघर्षरत हूँ। कभी थका हुआ, कभी बीमार, कभी लड़खड़ाता हुआ तो कभी हांफता हुआ। हाँ मेरी एकमात्र बेटी ने जब एम.डी.एस. (ओर्थोडोंटिक्स) में टॉप किया और गोल्ड मेडल ले आयी तब मेरी खुशियाँ अपार थीं। लेकिन तब उसे साझा करने के लिए उसकी मम्मी नहीं थीं। 2008 में ब्रेन हेमरेज से उनका निधन हो चुका था। तब से मैं तो निपट अकेला ही हूँ।

indiBooks : आपके जीवन में कोई ऐसी प्रेरक घटना घटित हुई है, जिसे आप कभी भूलना नहीं चाहेंगे ? लेकिन उसे आप हमारे पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे।
Arvind Gupta Ji : आरा में जब मेरी कहानी डॉ चंद्रभूषण तिवारी ने पढ़ी तो सुबह ही सुबह मुझे बधाई देने आये। वह कहानी थी ‘देहरी के पार’। जिसे उन्होंने ‘वाम-2’ में ‘नया पात्र’ के शीर्षक से छापा था। उस कहानी पर आरा में बहुत बड़ी गोष्ठी हुई थी और काफी तारीफ मिली थी।

indiBooks : हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के उत्थान पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
Arvind Gupta Ji : जी, सबसे पहले व्यवस्था द्वारा जो शब्दों पर प्रतिबन्ध लगाये हैं उन्हें हटाना होगा। व्यवस्था को कवियों, लेखकों और बुद्धिजीवियों से खतरे की बात हो रही है और उन्हें जेलों में डाला जा रहा है। दूसरे साहित्य में भाई-भतीजावाद, जातिवाद, बाजारवाद जैसे जहर वर्तमान हैं जिससे अनेक जेनुइन प्रतिभाएं कुंठित हो जाती हैं।

indiBooks : आप अपने पाठकों से क्या कहना चाहेंगे?
Arvind Gupta Ji : अंत में पाठकों यही कहना चाहूँगा कि अपनी पसंद को विकसित करें और सदा स्वस्थ और विचारशील साहित्य पढ़ें, साझा करें और फैलाएं।

indiBooks : आप नये लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?
Arvind Gupta Ji : नये लेखकों से यही कहना चाहेंगे कि स्वस्थ साहित्य लिखें, उत्पीड़ित मानवता की सेवा करें और छल-छद्म, भाई-भतीजावाद, बाजारवाद, सस्ती लोकप्रियता, गुटबाजी और सस्ते साहित्य से दूर रहें तथा कालजयी रचनाओं की रचना करें।

About the ‘Sawaal Dar Sawaal’

लेखक अरविन्द गुप्त जी की चर्चित चुनिन्दा कहानियां संग्रह से चुनकर यह संग्रह “सवाल दर सवाल” में संकलित की गई है।

prachi
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