‘बंद पन्ने’ सहित कई पुस्तकों के लेखक एवं संपादक राजीव कुमार झा जी से साक्षात्कार

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बंद पन्ने‘ एवं ‘जीरो नंबर‘ सहित कई सफल पुस्तकों के लेखक एवं संपादक राजीव कुमार झा जी indiBooks द्वारा साक्षात्कार किया गया। साक्षात्कार के दौरान राजीव जी की साहित्यिक यात्रा एवं उनके जीवन के खट्टे मीठे अनुभवों को जानने का अवसर प्राप्त हुआ। आपकी एक पुस्तक ‘बोये हुए शब्द‘ पिछले दिनों ही प्रकाशित हुई है। राजीव जी का जीवन सभी युवा रचनाकारों के लिए प्रेरित करने वाला भी है, यदि आप युवा रचनाकार है तो आपको राजीव जी का यह साक्षात्कार जरूर पढ़ना चाहिए। राजीव जी ने indiBooks टीम के सभी सवालों के बहुत सुलझे हुए जवाब दिये, जो निश्चित ही पाठकों को भी अवश्य पसंद आएंगे। पेश हैं आपके लिए साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश-

indiBooks : राजीव जी, नमस्कार। हम आपका शुक्रिया करना चाहते हैं क्योंकि आपने हमें साक्षात्कार के लिए अपना कीमती समय दिया। वैसे तो आपका परिचय आपकी किताब में पढ़ा जा सकता है, लेकिन हमारे पाठकों के लिए आपके शब्दों में पढ़ने का अनुभव अलग ही होगा?

Rajeev Kumar Jha : बहुत शुक्रिया आपका और आपकी पब्लिकेशन के लिए अनंत शुभकामनाएं भी। फिलहाल मैं बिहार के पूर्वी चंपारण के मोतिहारी प्रखण्ड में मुजीब बालिका उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में भाषा का शिक्षक हूँ। हिन्दी से एम.ए. हूँ। पी.एचडी जारी है। कुछ विभागीय शर्तों के कारण विलंब हो रहा है, लेकिन उस से मैं जल्द ही बाहर आ जाऊंगा। पिता जी श्री नरेंद्र झा पत्रकार रहें हैं। हिंदुस्तान, प्रभात ख़बर, दैनिक जागरण, दूरदर्शन में पत्रकारिता का एक लंबा अनुभव रहा है। माता जी श्रीमती रीता झा एक धार्मिक महिला हैं। छोटे भाई संजीव. के. झा मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में क्रियाशील हैं। कई धारावाहिकों के स्क्रिप्ट लिखने के अलावा सिद्धार्थ मल्होत्रा और परिनीति चोपड़ा अभिनीत फ़िल्म ‘जबरिया जोड़ी’ और ‘बरोट हाऊस’ फ़िल्म की पटकथा उन्होने लिखी है। एक शिक्षक के तौर पर मेरी दिनचर्या बिलकुल फ़िक्सड है। साढ़े नौ से चार के बीच स्कूल में होता हूँ। इसके बाद कुछ अतिरिक्त पढ़ने-पढ़ाने का कार्य भी होता है। देर रात और स्कूल के खाली समय में अपने लिखने के लिए समय निकालता हूँ। पत्रकारिता में लगभग 10 वर्षों तक खुद भी सक्रिय रहा, लेकिन शिक्षक बनने के बाद विभागीय नियमों के कारण अब लगभग उस से दूर हो गया हूँ। तो पत्रकारिता में एक पत्रकार के तौर पर दिया जाने वाला समय मैंने लेखन कार्य में लगा दिया है।

indiBooks : आपकी पहली पुस्तक कब प्रकाशित हुई थी, उसके बारे में जानकारी दें।

Rajeev Kumar Jha : मेरी पहली पुस्तक 2020 में प्रकाशित हुई। नाम था- ‘बंद पन्ने’। जिसका प्रकाशन हुआ था प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के बैनर तले। इसके लिए मैं प्राची डिजिटल पब्लिकेशन की पूरी टीम का भी आभारी हूँ। असल में ‘बंद पन्ने’ में संकलित कविताएं बहुत पहले की हैं। ये कई सालों से डायरी में पड़ी हुईं थी। सैकड़ों कविताओं के नष्ट होने के बाद कुछेक जो बच गईं थी उन्हें संकलन के रूप में लाने की योजना तब बनी जब पूरे देश में कोरोना त्रासदी के कारण लॉक डाऊन लगा था। इस किताब का प्रकाशन मेरी लेखनी को आगे दिशा देने का एक छोटा सा प्रयास था। मुझे यह कहने में तनिक भी आपत्ति नहीं है कि ‘बंद पन्ने’ से मेरी कविता या मेरे साहित्यिक कैनवास का सही आकलन नहीं किया जाना चाहिए।

indiBooks : राजीव जी,किसी भी लेखक या लेखिका के लिए पहली प्रकाशित पुस्तक बहुत ही मायने रखती है और उसके प्रकाशन की खुशी अलग ही होती है, क्या आप प्रथम प्रकाशन के उस अनुभव और खुशी को शब्दों में बयां सकते हैं?

Rajeev Kumar Jha : एक बेहद सामान्य दर्जे के कंटेंट वाली किताब होते हुए भी ‘बंद पन्ने’ मेरे लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है। ठीक वैसे जैसे किसी की जिंदगी में उसकी पहली प्रेमिका का महत्व होता है। आप चाह कर भी उसे ताउम्र भूल नहीं सकते। प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के सहयोग के कारण जब ‘बंद पन्ने’ ससमय मेरे हाथों में आयी तो मैं काफ़ी रोमांचित हो गया था। किताब की क्वालिटी भी उम्मीद से ज्यादा अच्छी थी। जिस किसी के हाथों में बंद पन्ने पड़ी, सराहना ही मिली। बहरहाल (मुस्कुराते हुए) ‘बंद पन्ने’ के साथ ही मैं एक प्रकाशित कवि बन गया था।

indiBooks : राजीव जी, पुस्तक प्रकाशन के लिए विचार कैसे बना या कैसे प्रेरणा मिली?

Rajeev Kumar Jha : मेरे पिता जी हमेशा कहा करते हैं कि मुझे अब अलग अलग नौकरियों के लिए ज़्यादा परेशान न होकर एक शिक्षक के तौर पर खुद को स्थायी करते हुए किताब लेखन की तरफ़ ध्यान देना चाहिए। मेरे नाना जी लगभग 70 किताबों के लेखक रहें हैं। मैं उनके काफ़ी करीब रहा था, इसलिए कविता, कहानी से जुड़ाव बचपन से ही रहा है, लेकिन किताब के लिए लेखन की प्रबल इच्छा लॉकडाऊन के दौरान 2020 में हुई। यह इच्छा हक़ीक़त में तब बदल गई जब लॉक डाऊन में मैं अपने घर पर लगभग दो माह अकेला रह गया।

indiBooks : राजीव जी, पिछले दिनों आपकी नई किताब ‘जीरो नंबर’ प्रकाशित हुई है, उसके बारे में कुछ बताएं। इस पुस्तक में आपने किन विषयों को रखा है?

Rajeev Kumar Jha : ‘ज़ीरो नंबर’ कहानी की मेरी पहली किताब है। ‘ज़ीरो नंबर’ में उन लोगों की कहानी है जिन्हें हमारा समाज आज भी ज़ीरो समझता है। जो हाशिये पर हैं। मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, लेकिन इन सबके बावजूद भी उनके दिल में कभी नकारात्मक बातों ने पैठ नहीं बनाया। बदले की दुर्भावना में उन्होने अपने जीवन को बर्बाद नहीं होने दिया। उन्होने ईमानदारी पूर्वक मेहनत की और अपने समाज, अपने परिवार की बदतर स्थिति को जैसे पलट कर रख दिया। ‘ज़ीरो नंबर’ की कहानियाँ मनगढ़ंत नहीं हैं। किरदारों के नाम और उनके मूल स्थान भले ही बदल दिये गए हैं। कहानियाँ युवा पीढ़ी को ध्यान में रख कर लिखी गईं हैं। कहानी में केवल संघर्ष नहीं है संघर्ष करते हुए फ़तह पाने का रास्ता भी दिखाया गया है।

indiBooks : राजीव जी, ‘जीरो नंबर’ एवं अन्य प्रकाशित पुस्तकों के लेखन से लेकर प्रकाशन तक आपके मित्र या परिवार या अन्य में सबसे ज्यादा सहयोग किससे प्राप्त होता है? आप यहाँ पर भी उनका शुक्रिया कर सकते है।

Rajeev Kumar Jha : पहला सहयोग तो पिता जी का ही हैं। उन्होंने हमेशा रचनात्मक कार्यों के लिए प्रोत्साहित किया। छोटे भाई संजीव के. झा ने अधिक से अधिक पढ़ने और लिखने के लिए हमेशा से प्रेरित किया और करते रहे हैं। वे जामिया मिलिया इस्लामिया विश्व विद्यालय (दिल्ली) के गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं। जाहिर है उनकी शिक्षा और उनकी सोच का स्तर काफ़ी उच्च दर्जे का है। इस मामले में मैं काफ़ी पिछड़ा हुआ हूँ, इसलिए काफ़ी ज़्यादा पढ़ना पड़ रहा है। लगता है जैसे शुरुआत ही हुई हो। धर्म पत्नी प्रिया कुमारी भी उतनी ही सहयोगी रहीं हैं क्योंकि एक लेखक के ‘एकाँकी टाईप लाईफ़’ को झेलना आसान काम नहीं है। उन्होने कभी भी ख़ुद के लिए मुझसे कभी कोई डिमांड नहीं किया। मित्र मंडली में जो भी हैं उन्होने हमेशा उत्साह बढ़ाया है। इसकी एक लंबी फेरहिस्त है, इसलिए कुछेक का नाम लेना उचित नहीं।

indiBooks : राजीव जी, ‘जीरो नंबर’ को पाठक क्यों पढ़े? अगर ऐसा कोई पूछ बैठे तो आपका जवाब क्या होगा?

Rajeev Kumar Jha : ज़ीरो नंबर की कहानियाँ आपको हतोत्साहित नहीं होने देंगी। इसकी कहानियाँ आपको मंजिल पाने के लिए संसाधन की कमी का रोना नहीं रोने देंगी। पाठक इसकी कहानियों में खुद को महसूस करेंगे। उन्हें ऐसा लगेगा जैसे उनकी हीं कहानी कही जा रही है। कहानियों का जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जिनमे यह देखा गया है कि कोई कहानी किसी इंसान के ‘लाईफ़ की टर्निंग पॉइंट’ बन गईं। इसलिए कम से कम युवाओं को एक बार तो यह कहानी पढ़नी ही चाहिए।

indiBooks : पुस्तक ‘जीरो नंबर’ के लिए रचनाओं के चयन से लेकर प्रकाशन प्रक्रिया तक के अनुभव को पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगें? ताकि पाठक जान सकें कि एक लेखक किस तरह से मेहनत करता है।

Rajeev Kumar Jha : आज किसी भी विधा में लिखने के लिए काफ़ी रिसर्च करना पड़ता है। वह चाहे कहानी हो या कविता। बिना रिसर्च किए आप यदि लिखते हैं तो मुझे लगता है कि आप अपने कंटेंट के साथ अन्याय कर रहे हैं। आपको अपने कंटेंट की बार-बार एडिटिंग करनी होती है। उसके बाद भी आपको इसके लिए प्रोफेशनल एडिटर रखने होते हैं। ताकि संस्करण में अशुद्धता नहीं रहें। पिछले कुछ वर्षों में युवाओं के बीच अवसाद काफ़ी बढ़ा है। आए दिन आप मेडिकल, इंजीनियरिंग या किसी उच्च ओहदे की तैयारी कर रहे किसी न किसी युवा द्वारा आत्महत्या की ख़बर पढ़ते या न्यूज़ चैनल पर देखते होंगे। यह दुर्भाग्य है। इतने अनमोल जीवन को जिस तरह ख़त्म कर दिया जाता है वह अपने आप में काफ़ी दुखद है। यह चीज़ मेरे जेहन में कुछ वर्षों से उथल पुथल मचा रही थी। इसी बीच मुझे एक ऐसे छात्र को पढ़ाने का मौका मिला जिसके दोनों ही हाथ बचपन से नहीं थे। वह पैर से लिखता था। इसके लिए उसकी माँ ने कितना संघर्ष किया और उसके समाज से प्रारम्भ में उसे किस तरह के आऊटपुट मिलते थे, काफ़ी दिलचस्प था मेरी कहानी के लिए। फ़िर मैंने ऐसे लोगों की पड़ताल शुरू की, जिन्होने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपना मुकाम हासिल किया और अपने समाज, देश का नाम रौशन किया। ये किरदार मेरी कहानी के पात्र बनते गए और फ़िर ‘ज़ीरो नंबर’ का कांसेप्ट किताब के रूप में आया। इसके लिए रात को कई घंटे लैप टॉप पर काम करना पड़ता था। कई दफ़ा तबीयत खराब हुई। लेकिन लिखने और पढ़ने का जो जुनून तैयार हुआ, उसको मैं शब्दों में नहीं बता सकता। अभी ‘ज़ीरो नंबर’ किताब का पहला भाग आया है। आगे और भी भाग आएंगे इससे इंकार नहीं कर सकता।

indiBooks : राजीव जी, अब तक प्रकाशित पुस्तकों के बारे में जानकारी देना चाहेंगें?

Rajeev Kumar Jha : सबसे पहले मेरी पहली किताब ‘बंद पन्ने’ आयी जो काव्य संकलन है। उसके बाद से ‘ज़ीरो नंबर’ (कहानी संग्रह), ‘क्या लिखूँ मैं’ (काव्य संग्रह ), ‘बोये हुए शब्द’ (काव्य संग्रह) प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके अलावा कुछ साझा संग्रह का भी हिस्सा रहा हूँ। मसलन- ‘काव्य प्रभा’ (काव्य संग्रह), ‘अनुभूति’ (काव्य संग्रह), ‘स्वदेश प्रेम’ (काव्य संग्रह), ‘दिल कहता है’ (काव्य संग्रह), ‘कहानियाँ’ (कहानी संग्रह), ‘अनामिका’ (काव्य संग्रह), ‘उड़ान’ (काव्य संग्रह)। इस दौरान मैंने ‘अनामिका’ (काव्य संकलन) और ‘उड़ान’ (काव्य संकलन) का सम्पादन भी किया। यह लेखन यात्रा अब भी जारी है।

indiBooks : राजीव जी,आप साहित्य सृजन कब से कर रहें हैं, अब तक अर्जित उपलब्धियों की जानकारी देना चाहेंगे?

Rajeev Kumar Jha : मेरी पहली कविता ‘अगर मैं पक्षी होता’ 1995 में आर्यावर्त अखबार में छपी थी। उस दिन की खुशी आपको बयान नहीं कर सकता हूँ। दुर्भाग्यवश उसकी प्रति मेरे पास उपलब्ध नहीं है। फ़िर हिंदुस्तान में मेरी पहली कहानी छपी थी- ‘चाँदनी’। यह 2004 का वर्ष था। यह उसके राष्ट्रीय एडिशन में छपी थी। इसके बाद प्रभात ख़बर में दर्जनों कविताएं छपीं। तो आप कह सकते हैं कि सृजन का जो समय था वह बचपन से हीं शुरू था भले हीं उसका स्तर जो भी रहा हो। लेकिन एक ‘मैचुअर्ड’ लेखक के रूप में मैंने 2006 से लिखना शुरू किया है ऐसा मैं मानता हूँ। ख़ास कर के तब से जब से मैंने पत्रकारिता शुरू की।

indiBooks : राजीव जी, आप सबसे ज्यादा लेखन किस विधा में करते है ? और क्या इस विधा में लिखना आसान है ?

Rajeev Kumar Jha : अभी तक की जो स्थिति है उस आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि अब तक मैंने काव्य विधा में अधिक काम किया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कविता लिखना आसान है। फ़िर भी यह कहना सही होगा कि एक मेहनतकश साहित्यकार के लिए कविता, कहानी या किसी विधा में लिखना संभव है। इधर दो तीन वर्षों में छोटे भाई संजीव. के. झा द्वारा उपलब्ध कराये गए अनगिनत किताबों को पढ़ने के बाद मुझे लगता है कि साहित्य के क्षेत्र में मैं शायद एक नवजात बच्चे की तरह हूँ। पहले के बनिस्पत मुझे लिखने से पहले अब बहुत पढ़ना होता है। या यह कहूँ कि अब बहुतों को पढ़ रहा हूँ। उनको भी जिनका नाम तक पहले नहीं सुना था। कहानी या उपन्यास कविता के मुक़ाबले थोड़ा कठिन और समय लेने वाली विधा जरूर है, लेकिन मुझे इनमें भी पूरी दिलचस्पी है और इस विधा में भी कई सारे प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूँ।

indiBooks : राजीव जी, आपकी रचनाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत क्या है?

Rajeev Kumar Jha : आस पास के वातावरण में नियत घटने वाली घटनाएँ मेरी रचनाओं के लिए प्रेरणा का कार्य करती हैं। इनके अलावा कई साहित्यकारों की जीवन गाथा, उनकी लेखनी की यात्राएं मेरे लिए प्रेरणा का कार्य करतीं हैं। चंपारण के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक अनुरंजान झा की किताबें ‘राम लीला मैदान’ और ‘गांधी मैदान’ ने भी मुझे काफ़ी प्रेरित किया। मेरे पिता जी का संघर्षमय जीवन और उन प्रतिकूल परिस्थितियों का साहस पूर्वक सामना करने की अनुभूति भी मेरे लिए प्रेरणा का कार्य करती हैं।

indiBooks : आपके जीवन में विशेष उपलब्धि, जिसे आप हमारे और अपने पाठकों के साथ भी शेयर करना चाहते हैं?

Rajeev Kumar Jha : उपलब्धि के नाम पर मेरे जीवन में अभी कुछ नहीं है, लेकिन जिन परिस्थितियों में मैंने ख़ुद को यहाँ तक ला कर खड़ा कर दिया उसे मुझे जानने वाले जरूर उपलब्धि मानते हैं। अपने तमाम बुरे दिनों में, अपने रिश्तेदारों द्वारा अलग थलग किए जाने के बाद भी मैंने या मेरे परिवार के किसी भी सदस्य ने अपना ईमान गिरने नहीं दिया, कभी किसी का हक नहीं मारा, अपना हौसला नहीं टूटने दिया, आगे बढ़ने के लिए कोई गलत रास्ता नहीं अपनाया, अपने ड्यूटी के साथ ईमानदारी बरती। शायद यही मेरी अब तक की उपलब्धि है।

indiBooks : हर लेखक का अपना कोई आईडियल होता है, क्या आपका भी कोई आईडियल लेखक या लेखिका हैं ? और आपकी पसंदीदा किताबें जिन्हें आप हमेशा पढ़ना चाहेंगें ?

Rajeev Kumar Jha : मेरे नाना जी स्व. रमेश चन्द्र झा ही मेरे आइडियल लेखक हैं। उनकी रचनाओं में एक आम इंसान का दिल बोलता है और उम्मीद गाती है। यह अलग बात है कि आज के चकाचौंध में साहित्य जगत ने उनका बहुत सही मूल्यांकन नहीं किया। उनके अलावा मुझे मुक्तिबोध, दिनकर, निराला, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय, उदय प्रकाश, अदम गोंडवी, प्रेमचंद, रेणु, केदारनाथ अग्रवाल, ध्रुव गुप्त की रचनाएँ बहुत भाती हैं। सेव द कैट,सीड फ़ील्ड की किताबें, द आर्ट ऑफ ड्रामेटिक राइटिंग, गोदान, मैला आँचल, यह देश है वीर जवानों का, रश्मीरथी, रामचरित मानस, पथ के दावेदार, जहां जंगल शुरू होता है, पढ़ना अच्छा लगता है और इनको कई बार पढ़ चुका हूँ।

indiBooks : राजीव जी, आप परिवार और शिक्षा सेवा में कार्यरत रहकर साहित्य सृजन के लिए समय कैसे निकालते हैं?

Rajeev Kumar Jha : लगभग 500 उपन्यासों के लेखक रोबर्ट रेनडीसी को मैं फॉलो करता हूँ। उनकी लेखन-जीवन से मैं बहुत प्रभावित हूँ। यही वजह है कि मुझे तमाम व्यस्तताओं के अलावा लिखने के लिए समय मिल जाता है। पिछले दो सालों में तो मैंने अपने अब तक के जीवन की सबसे ज़्यादा पढ़ाई और रचनाएँ लिखी है। आप यह भी कह सकते हैं कि मैंने खाली समय का सही उपयोग किया है। स्कूल में लिजर पीरियड के दौरान मैं अपने लैपटॉप के साथ होता हूँ। प्रयास रहता है कि कम से कम दस पेज लिखूँ। ज़्यादातर मैं यह कार्य कर ही लेता हूँ। फ़िर कक्षा लेने के समय मेरा लैपटॉप चार्ज़ में लगा होता है। अब खाली समय में अपने सहकर्मियों के साथ हंसी मज़ाक करने का वक्त मेरे पास नहीं होता। कहीं शादी या अन्य समारोहों में मैं ज़्यादा शिरकत नहीं कर पाता हूँ। यदि किसी दिन मैं कुछ नहीं लिख पाता उस दिन मेरा मूड खराब रहता है। बात बात में घर के लोगों से उलझ पड़ता हूँ। पागलों वाली स्थिति हो जाती है। हालांकि एकांकी जीवन जीने की चाह की आदत के कारण मैंने अपने कई सारे मित्र और रिश्तेदार खो दिये हैं, क्योंकि मेरी मनोदशा वह नहीं समझ पाते और वह समझे भी क्यूँ? मेरे जीवन के लिए अब लिखने के बाद ही कोई दूसरी चीज़ महत्वपूर्ण है। हालांकि मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और मेरे माँ, पिता जी का पूरा समर्थन रहता है। इस मामले में मैं सौभाग्यशाली हूँ।

indiBooks : हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के उत्थान पर आप कुछ कहना चाहेंगे?

Rajeev Kumar Jha : देखिए! हिन्दी केवल भाषा नहीं है। यह एक विश्व भाषा है। संसार की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। डिजिटलाइजेशन युग में भी सीना ताने हुए फलने फूलने वाली भाषा है। इसका अनवरत उत्थान ही होना है। बस हमें अति हिन्दीवादी होने से बचना होगा। पांडित्य प्रदर्शन करके हम हिन्दी को आम जन की भाषा नहीं बना सकते। उदय प्रकाश नें अपनी कविता ‘एक भाषा हुआ करती है’ में हिन्दी को अलग तरह से दिखाया है। हरेक माह हिन्दी में अनगिनत रचनाएँ हो रहीं हैं। बड़े बड़े देशों के विद्यार्थी भारत आकर हिन्दी सीख रहें हैं। यह हिन्दी का रुतबा है। हमें भी हिन्दी बोलते हुए या लिखते हुए गर्व का एहसास होना चाहिए।

indiBooks : शिक्षण कार्य और साहित्य सृजन के अलावा अन्य शौक या हॉबी, जिन्हे आप खाली समय में करना पसंद करते हैं ?

Rajeev Kumar Jha : स्कूल में शिक्षण और फ़िर खाली समय में साहित्य सृजन के अलावा मेरे पास बहुत कम समय होता है जो खाली हो। बावजूद इसके यदि समय मिल गया तो मैं अपनी किताब की आलमारी में एक एक किताब का निरीक्षण करने में अपना समय बिताता हूँ। पहले स्वस्थ था तो कभी-कभार क्रिकेट भी खेलता था। अब वह संभव नहीं हो पाता।

indiBooks : अब तक पुस्तक प्रकाशन के दौरान प्रकाशन अनुभव और प्रकाशकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?

Rajeev Kumar Jha : 2019 की बात है। फ़ेसबूक यूज़ करने के दौरान मेरी नजर प्राची डिजिटल पब्लिकेशन पर पड़ी थी। उससे पहले भी कई प्रकाशक संपर्क में थे। मेरे घर में कई लोग लेखन कार्य से जुड़े हैं इसलिए मेरे लिए यह अनुभव कोई नया नहीं था। बावजूद इसके जब मैंने प्राची डिजिटल पब्लिकेशन टीम से किताब के प्रकाशन से संबन्धित बातें की तो उनके सकारात्मक व्यवहार से मैं आशान्वित हुआ, लेकिन जितने कम समय में और जितनी आसानी से मेरी पहली कृति ‘बंद पन्ने’ (काव्य संग्रह) प्राची डिजिटल पब्लिकेशन से प्रकाशित हुई उतने का भरोसा मुझे नहीं था। क्वालिटी के मामले में तो जितना सोचा था उस से कई गुना ज़्यादा बेहतरीन क्वालिटी मुझे मिली। जिनके हाथों में भी ‘बंद पन्ने’ की प्रति पहुंची, किताब के पन्ने की क्वालिटी, पृष्ठ सज्जा आदि को वाह वाही मिली ।इसके लिए मैं इस पब्लिकेशन का शुक्रगुजार हूँ। एक नए लेखक और एक पहली किताब के लेखक को किस तरह से ट्रीट किया जाता है; प्राची डिजिटल पब्लिकेशन इस मामले में मेरे लिस्ट में टॉप पर है; और यही कारण है कि अब तक प्रकाशित मेरी सारी पुस्तकें प्राची डिजिटल पब्लिकेशन से ही प्रकाशित हुई हैं और कई प्रकाशनाधीन हैं।

indiBooks : राजीव जी,क्या भविष्य में कोई किताब लिखने या प्रकाशित करने की योजना बना रहें हैं? यदि हां ! तो अगली पुस्तक किस विषय पर आधारित होगी?

Rajeev Kumar Jha : लिखने का कार्य तो अंतिम समाधि लेने तक अनवरत जारी रहेगा। फिलहाल भी लेखन की यह यात्रा जारी है। ‘बंद पन्ने’, ‘ज़ीरो नंबर’ और ‘क्या लिखूँ मैं’ के बाद अभी अभी बोये हुए पन्ने (काव्य संग्रह) प्रकाशित हुई है। इनके अतिरिक्त डिबिया (काव्य संग्रह), दी राइटर्स (उपन्यास), कहने में हर्ज़ क्या है ( काव्य संग्रह), कोहिनूर-ए-चंपारण (आलेख) पर कार्य जारी है। एक के बाद एक इनका प्रकाशन भी होता रहेगा। बस शर्त इतनी सी है कि शरीर स्वस्थ रहे और जीवन के पल अभी बचे हों।

indiBooks : साहित्य की दुनिया में नये-नये लेखक आ रहे है, उन्हें आप क्या सलाह देगें ?

Rajeev Kumar Jha : जहां तक नए नए लेखकों की बात है; मुझे तो यह लगता है कि अभी मैं ही बहुत नया हूँ। साहित्य जगत का एक बेहद अदना सा शख़्स। फ़िर भी जो आपने पूछा है उस संदर्भ में मैं यहीं कहूँगा कि यह साहित्य जगत के लिए सुखद है। जितनी रचनाएँ जिस भाषा में होंगी, उतनी ही ज़्यादा वह भाषा समृद्ध होगी। मुझे तो ऐसा लगता है प्राची डिजिटल पब्लिकेशन जैसे प्रकाशक भी शायद एक वजह हैं जिस कारण रचनाकारों की संख्या बढ़ रही है। रचनाकार आसानी से अब एक प्रकाशित लेखक बन रहे हैं।

इन सबसे इतर एक बात मैं अपने अनुभव से कहना चाहूँगा कि लिखने के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है। एक से बढ़ कर एक रचनाकर हमारी हिन्दी भाषा या अन्य भाषाओं में मौजूद हैं। इनको पढ़ना हर रचनाकार के लिए आवश्यक है। आपकी रचनाओं को देखकर आपके ‘राइटिंग स्ट्रेंथ’ का पता चलता है। बिना पढ़े आप रचना तो कर सकते हैं लेकिन अपना स्तर नहीं सुधार सकते। दूसरी बात, सीखने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए क्यूंकि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।

indiBooks : क्या आप भविष्य में भी लेखन की दुनिया में बने रहना चाहेंगे?

Rajeev Kumar Jha : (मुस्कुराते हुए) असल में लिखना मेरी जरूरत हो गई है। अब तो समय कम पड़ने लगा है। सोचता हूँ कि काश! एक दिन 24 घंटे का न होकर 48 का होता तो शायद प्रतिदिन लिखने का कुछ और अतिरिक्त समय मिलता। खैर! लिखने को मैंने अपने दिनचर्या में शुमार किया है और यह अनवरत रूप से अथक जारी है। कई सारी किताबों के कार्य अधूरे हैं। उन सबको पूरा करने में वर्षों लग जाएंगे। किताबों का सैकड़ा लगाने की चाहत है। यह दिलचस्प होगा कि यह कहाँ तक संभव हो पाता है, इसलिए लिखना हीं अब मेरी दुनिया है।

indiBooks : राजीव जी, यह अंतिम प्रश्न है, आप अपने अज़ीज शुभचिन्तकों,पाठकों और प्रशंसकों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगें?

Rajeev Kumar Jha : अपने तमाम शुभचिंतकों और आदरणीय पाठकों से मेरा निवेदन होगा कि वह मेरी रचनाओं को अपना प्यार देते रहें। एक साहित्यकार के लिए उसका पाठक वर्ग ही उसका सब कुछ होता है। हिन्दी की किताबों को अधिक से अधिक खरीद कर पढ़ें। चाहे वह जिस लेखक की हो। आपका यह समर्थन लेखक को लेखकीय जीवन देगा और उसका उत्साह बढ़ेगा। महत्वपूर्ण मौकों पर दिये जाने वाले उपहारों में किताबों को शामिल करें इस से एक अच्छे प्रचलन की शुरुआत होगी, साहित्य उर्वर होगा, रचनाकार का उत्साह जीवित रहेगा एवं हिन्दी और ज़्यादा फले फूलेगी।

राजीव कुमार झा जी का जीवन परिचय एवं प्रकाशित पुस्तकों की जानकारी के लिए विजिट करें।

राजीव झा जी के साथ किया गया साक्षात्कार आपको कैसा लगा, यदि आपने लेखक की पुस्तकें पढ़ी है तो उसे बारे में आप कमेंट करके बता सकते हैं ताकि अन्य पाठकगण भी आपके रिव्यू से पुस्तकें पढ़ने का मन बना सकें।

prachi

1 COMMENT

  1. जीरो नंबर किताब पढ़ने के बाद मुझे बहुत मोटिवेशन मिला और मैं जब वह किताब पढ़ रहा था, तो मुझे ऐसा कहीं नहीं लगा कि मैं किताब पढ़ रहा हूं। मुझे लगा कि मैं कहानी देख रहा हूं। मै उस कहानी का कल्पना कर सकता था। और जीरो नंबर के अगले भाग का मुझे बेसब्री से इंतजार है। और ऊपर सर के साथ किया गया साक्षात्कार को पढ़ने के बाद मेरे अंदर भी एक उत्साह उत्पन्न हो रहा है कि मैं भी सर के नक्शे कदम पर चलूं।

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