‘स्वदेश प्रेम’ साझा काव्य संकलन के लेखक रवि शंकर साह जी से साक्षात्कार

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पिछले दिनों प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के द्वारा ‘स्वदेश प्रेम‘ साझा काव्य संग्रह प्रकाशित किया गया है। जिसका संपादन डॉ. मीना कुमारी सोलंकी द्वारा किया गया है। ‘स्वदेश प्रेम’ में देश भर से कई कवियो ने प्रतिभाग किया है, जिनमें से कुछ कवियो के साक्षात्कार प्रकाशित किये जा रहे हैं। पेश है ‘स्वदेश प्रेम’ काव्य संग्रह के एक लेखक रवि शंकर साह जी से साक्षात्कार-

indiBooks : कृपया संक्षेप में अपने शब्दों में अपना परिचय दें?

Ravi Shankar Sah : मेरा नाम- रवि शंकर साह है, मेरा जन्म देवाधिदेव महादेव की नगरी देवघर झारखंड के बलसारा गांव में सन 16 जनवरी 1982 को हुआ है। मेरे पिता का नाम स्वर्गीय जय शिव साह व माता- कैथा देवी है। सहधर्मिणी पूनम कुमारी है जिसका साथ हमेशा रहा है। चाहे शिक्षण हो या लेखन कार्य। हमारी शिक्षा-दीक्षा देवघर में ही स्नातक तक हुई हैं। शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त है। पूर्व में 10 वर्ष तक एक पत्रकार के तौर पर प्रभात खबर, दैनिक जागरण, आवाज, इंडियन पंच, सहित विभिन्न हिन्दी दैनिक पत्र में कार्य किया। साथ ही 8 वर्ष तक विभिन्न टीवी चैनलों में भी। वर्तमान में साहित्यिक पटल साहित्य समागम भारत का राष्ट्रीय संयोजक, सचिव- सर्वोदय फाउंडेशन ट्रस्ट (रजि.) निदेशक – सर्वोदय आवासीय विद्यालय, देवघर सदस्य- जनवादी लेखक संघ, देवघर मीडिया प्रभारी- जिला प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन, देवघर के तौर पर कार्य कर रहा हूँ।

indiBooks : आपने साझा संकलन संग्रह ‘स्वदेश प्रेम’ में प्रतिभाग किया है, इसमें शामिल होने के पीछे क्या कारण रहा?

Ravi Shankar Sah : ‘स्वदेश प्रेम’ की सम्पादिका डॉ. मीना जी का अनुरोध आया कि देशभक्ति से ओतप्रोत एक संग्रह प्रकाशित करने की योजना है, जिसमें 101 लोग शामिल होंगे। काफी लोग जुड़ गए हैं। एक-दो लोगों की कमी है। आप इससे जुडेंगे तो अच्छा रहेगा। उन्होंने बताया कि प्राची डिजिटल पब्लिकेशन से पुस्तक प्रकाशित हो रही है। मैं पहले से ही प्रकाशक के अच्छे व मित्रवत व्यवहार से परिचित था, इस प्रकार इस संग्रह जुड़ने का मन बना लिया। इससे जुड़ कर अच्छा लगा। ‘स्वदेश प्रेम’ एक राष्ट्रभक्ति से प्रेरित संग्रह है जिसमें विभिन्न प्रांतों, देश देशांतर और भारतवर्ष की कोने कोने के साहित्यकार अपनी रचनाएं प्रेषित की है। सर्वप्रथम देश प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है:- जो भरा नहीं भावो से बहता रसधार नहीं। हृदय नहीं वह पत्थर है जिसे स्वदेश से प्यार नहीं।। ऐसा कहकर कवि ने देश के प्रति अपनी प्रेम भावना को व्यक्त किया है। वर्तमान परिस्थिति में जहां आए दिन छोटी-छोटी बातों को लेकर के धरना प्रदर्शन एक धर्म से दूसरे धर्म के प्रति जो वैमनस्यता की बीज बो रहे हैं उसको समाप्त कर हमारे देश में सिर्फ और सिर्फ देश प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म और मानव के मानव के प्रति प्रेम ही सर्वोपरि गर्म होना चाहिए।

indiBooks : साहित्यिक सेवा के लिए आपको अब तक कितने सम्मान प्राप्त हुए हैं? क्या आप उनके बारे मे जानकारी दें?

Ravi Shankar Sah : साहित्य सेवा के लिए हमें अबतक कई सम्मान मिल चुके है। जिसमें कुछ महत्वपूर्ण सम्मान 1. महाकवि नीरज सम्मान वर्ष 2020 (विश्व हिन्दी रचनाकार मंच), 2. रविन्द्र चन्द्र भौमिक स्मृति साहित्य भूषण सम्मान, आर सी भौमिक मेमोरियल ट्रस्ट (पश्चिम बंगाल), 3. गुरु बृहस्पति सम्मान साहित्य संगम संस्थान, नई दिल्ली, 4. साहित्य श्री सम्मान साहित्य उन्नयन मंच, 5. भगवती देवी स्मृति सम्मान खोरठा भाषा साहित्य सृजन मंच, 6. सविता देवी स्मृति सम्मान बांका अंगिका महोत्सव, 7. अनुभूति 2020 सम्मान, प्राची डिजिटल पब्लिकेशन, 8. ऑथर ऑफ द मंथ अगस्त 2020 सम्मान, द साहित्य संस्थान, मेरठ सहित विभिन्न साहित्यिक मंचों द्वारा कई मूहत्वपूर्ण सम्मान है।

indiBooks : क्या आपकी पूर्व में कोई पुस्तक प्रकाशित हुई है?

Ravi Shankar Sah : अभी तक पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है लेकिन रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई है, जिनमें आनुभूति स्वदेश प्रेम, काव्यपथ पर, नीला आकाश आदि साझा संग्रह है। कुछ रचनाएं खोरठा और अंगिका भाषा की रचनाएं भी प्रकाशित हो चुकी है।

indiBooks : लेखन के अलावा आप क्या व्यवसाय करते है?

Ravi Shankar Sah : मै देवाधिदेव महादेव की नगरी देवघर में सर्वोदय आवासीय विद्यालय का संचालन विगत 11 वर्षों से कर रहा हूँ। यहां नर्सरी से दशम तक की पढ़ाई होती है। पढ़ाई के साथ साथ खेलकूद व सांस्कृतिक विरासत से भी बच्चों को अवगत कराते हैं। विद्यालय का उद्देश्य केवल शिक्षा नहीं संस्कार भी देना है। इसका प्रबंधन सर्वोदय फाउंडेशन ट्रस्ट करता है। शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के अविभावकों का भरपूर प्यार और सहयोग मिल रहा है। यहां ग्रामीण क्षेत्रों को बच्चों को आर्थिक सहायता के साथ नामांकन में भी छूट दिया जाता है। शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के अविभावकों का भरपूर प्यार और सहयोग मिल रहा है। यहां ग्रामीण क्षेत्रों को बच्चों को आर्थिक सहायता के साथ नामांकन में भी छूट दिया जाता है।

indiBooks : आपकी पसंदीदा लेखन विधि क्या है, जिसमें आप सबसे अधिक लेखन करते हैं, क्यों?

Ravi Shankar Sah : कविता, कहानी, लघुकथा, गीत, हाइकु, दोहे, ड्रामा स्क्रिप्ट लेखन आदि। छंद मुझे प्रिय है अभी छंद में लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं अक्षर गुनगुनाते रहता हूं। हिंदी भाषा भारत की राष्ट्रभाषा है जो भारत को एकता के सूत्र में पीरों कर रखती है। यह हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं बल्कि मातृभाषा भी है जिस प्रकार मां के बिना यह संसार सुना सा लगता है, उसी प्रकार मातृभाषा हिंदी के बिना यह भारतवर्ष अव्यक्त सा प्रतीत होगा। हिंदी साहित्य आज अक्षय नीर निधि की भांति विभिन्न प्रकार के साहित्य से लबालब है, हमारी हिंदी भाषा का साहित्य विशाल से विशालतम की ओर है और इसकी विशालता दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाएगी, मुझे पूर्ण विश्वास है।

indiBooks : आपका सबसे प्रिय लेखक / लेखिका और उनकी रचनाएँ / किताब? क्या उनके बारे में बताएंगे?

Ravi Shankar Sah : हिंदी साहित्य के सभी लेखक एवं साहित्यकार मुझे अच्छे लगते हैं। इनमें से कुछ साहित्यकार जैसे गोस्वामी तुलसीदास, महाकवि सूरदास, मैथिलीशरण गुप्त, महाप्राण निराला, महादेवी वर्मा, प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, नीरज की साहित्य मुझे बाल्यकाल से ही प्रेरणा प्रदान करने वाले रहे। राम चरित्र मानस गोस्वामी तुलसीदास की रचित हमें विरासत में सुनने के साथ पढ़ने को भी मिला जिससे अत्यधिक प्रभावित हुए एवं जीवन को एक नई दिशा और गति मिली। पंत जी की प्रकृति वर्णन उनके काव्य की जो सौंदर्य वह जीवन के हर क्षेत्र को छुआ एवं प्रेरणा से भरे रहा पंतजी की एक पंक्ति मुझे आज भी याद है- वन की सुनी डाली पर कलियों ने सीखा मुस्काना। मैंने अब तक सीखना पाया दुख से सुख को अपनाना। इसी प्रकार रामधारी सिंह दिनकर जी की प्रत्येक रचनाएं मुझ से भरपूर एवं जीवन संदेश देने वाला है, इस प्रकार हिंदी के मूर्धन्य एवं लोकप्रिय साहित्यकारों की रचनाएं अध्ययन करने और सुनने का अवसर प्राप्त हुआ जो हमारे जीवन को पल प्रतिपल स्पर्श करता है।

indiBooks : हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के उत्थान पर आप कुछ कहना चाहेंगे?

Ravi Shankar Sah : हिंदी भाषा भारत की राष्ट्रभाषा है जो भारत को एकता के सूत्र में पीरों कर रखती है। यह हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं बल्कि मातृभाषा भी है। जिस प्रकार मां के बिना यह संसार सुना सा लगता है। उसी प्रकार मातृभाषा हिंदी के बिना यह भारतवर्ष अव्यक्त सा प्रतीत होगा। हिंदी साहित्य आज अक्षय नीर निधि की भांति विभिन्न प्रकार के साहित्य से लबालब है। हमारी हिंदी भाषा का साहित्य विशाल से विशालतम की ओर है और इसकी विशालता दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाएगी मुझे पूर्ण विश्वास है। हिंदी भाषा भारत की राष्ट्रभाषा है जो भारत को एकता के सूत्र में पीरों कर रखती है यह हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं बल्कि मातृभाषा भी है। जिस प्रकार मां के बिना यह संसार सुना सा लगता है उसी प्रकार मातृभाषा हिंदी के बिना यह भारतवर्ष अव्यक्त सा प्रतीत होगा। हिंदी साहित्य आज अक्षय नीर निधि की भांति विभिन्न प्रकार के साहित्य से लबालब है हमारी हिंदी भाषा का साहित्य विशाल से विशालतम कीओर है और इसकी विशालता दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाएगी मुझे पूर्ण विश्वास है।

indiBooks : क्या वर्तमान या भविष्य में कोई किताब लिखने या प्रकाशित करने की योजना बना रहें हैं? यदि हां! तो अगली पुस्तक किस विषय पर आधारित होगी?

Ravi Shankar Sah : मां सरस्वती की कृपा से दिन प्रतिदिन साहित्य का सृजन निरंतर गति से प्रवाह मान है और वर्तमान में भी बहुत से लेखन कार्य चल रहा है। निकट भविष्य में उपन्यास लिखने की मंशा है, मां वीणा वादिनी की कृपा रही तो निकट भविष्य में जल्द प्रकाशित होगी। मां भारती की कृपा से दिन प्रतिदिन साहित्य का सृजन निरंतर गति से प्रवाह मान है और वर्तमान में भी बहुत से लेखन कार्य चल रहा है। वादिनी की कृपा रही तो निकट भविष्य में जल्द प्रकाशित होगी। मां भारती की कृपा से दिन प्रतिदिन साहित्य का सृजन निरंतर गति से प्रवाह मान है और वर्तमान में भी बहुत से लेखन कार्य चल रहा है।

indiBooks : अपने पाठकों और प्रशंसकों को क्या संदेश देना चाहते हैं?

Ravi Shankar Sah : जीवन में कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता हर कार्य समान होते हैं, बस उसको करने वाले की इच्छा शक्ति एवं उसके उत्कृष्ट सोच पर निर्भर करता है। हम अपने हर कार्य को पूर्ण मन से करें और अपनी रूचि के अनुसार क्षेत्र चुनकर के उसमें अपने श्रेष्ठ मेहनत के द्वारा नवीनतम स्वरूप देकर निकृष्ट में भी अच्छा से अच्छा उत्कृष्ट स्वरूप निखारने की कला को विकसित करें। एवं समय का पल प्रतिपल क्षण क्षण का उपयोग मितव्ययिता से करें। हम अपने हर कार्य को पूर्ण मन से करें और अपनी रूचि के अनुसार क्षेत्र चुनकर के उसमें अपने श्रेष्ठ मेहनत के द्वारा नवीनतम स्वरूप देकर निकृष्ट में भी अच्छा से अच्छा उत्कृष्ट स्वरूप निखारने की कला को विकसित करें।

About the Book

The feeling of ‘Swadesh Prem’ is inherent in us. We should perform our duty towards the country. There is no need to show any love in the country and neither does it have any place, but there is a need to hold the feeling of love in the heart for the country. The true country lover wishes the country prosperity by not giving its happiness. This book is included in the spirit of ‘Swadesh Prem’, full of passion. This is not just a book, it is the creators’ indigenous love for the country. According to the editor, hopefully when you start reading it, the flow of reading will remain until the last page.

prachi

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