‘काव्य प्रभा’ साझा काव्य संकलन की संपादिका सुधा सिंह ‘व्याघ्र’ जी से साक्षात्कार

2
84

पिछले दिनों प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के द्वारा काव्य प्रभा साझा काव्य संग्रह प्रकाशित किया गया है। जिसका संपादन सुधा सिंह ‘व्याघ्र’ द्वारा किया गया है। ‘काव्य प्रभा’ में देश भर से कई कवियो ने प्रतिभाग किया है, जिनमें से कुछ कवियो के साक्षात्कार प्रकाशित किये जा रहे हैं। पेश है ‘काव्य प्रभा’ काव्य संग्रह की संपादिका एवं लेखिका सुधा सिंह ‘व्याघ्र’ जी से साक्षात्कार-

indiBooks : क्या आप अपने शब्दों में हमारे सम्मानित पाठकों को अपना परिचय देना चाहेंगे? क्योंकि आपके शब्दों में हमारे पाठक आपके बारे में ज्यादा जान पाएंगे।

Sudha Singh : मैं सुधा सिंह ‘व्याघ्र’ (‘व्याघ्र’ मेरे गोत्र का नाम है जिसे मैं अपने नाम के साथ जोड़ती हूँ) उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में जन्मी, और मुंबई में पली – बढ़ी अपने माता- पिता की प्रथम सन्तान हूँ। माता – पिता से बहुत अधिक स्नेह मिला। ईश्वर की कृपा से दो प्यारे बच्चों की माता होने का सौभाग्य प्राप्त है। पति का अपना व्यवसाय है और मैं नवी मुंबई के एक प्रतिष्ठित अन्तरराष्ट्रीय विद्यालय में उच्च माध्यमिक कक्षाओं में अध्यापक के पद पर कार्यरत हूँ। साल 2019 को मेरे पिता से मुझे दूर करके नियति ने एक ऐसा घाव दिया जिसका कोई मरहम नहीं है। उनकी अनुपस्थिति सदैव एक खालीपन का अहसास कराती है।

indiBooks : साझा काव्य संग्रह ‘काव्य प्रभा’ में अन्य सहयोगी रचनाकारों के साथ सहयोगी रचनाकार के रूप में आपका अनुभव कैसा रहा?

Sudha Singh : मैं अपने सभी साथी रचनाकारों के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहूँगी। सम्पादक के रूप में उन्होंने मुझमें अपना जो विश्वास जताया व‍ह अवर्णनीय है। भविष्य में भी मुझे उनके साथ काम करने में अतिव प्रसन्नता होगी।

indiBooks : साझा काव्य संग्रह ‘काव्य प्रभा’ में आपकी रचनाएं किस विषय पर आधारित हैं?

Sudha Singh : मेरी सभी रचनाएँ अलग अलग भावों से सजी है।

प्रथम रचना : टूटी जब आशा की डोरी (नवगीत) – उन युवाओं की व्यथा कथा है जो जीवन की विद्रूपताओं से जल्द ही निराश होकर गलत दिशा में कदम बढ़ा देते हैं और दूसरों पर दोषारोपण करते हैं।

द्वितीय रचना ‘हो गया दूर तुझसे’ (गीत) प्रेम की दिव्य गाथा है जिसमें प्रेमी अपनी मृत्योपरांत अपनी प्रेमिका के लिए खुशहाल जीवन की आशा करता है। उससे हर हाल में खुश रहने का वचन माँगता है।

अगली रचना ‘तेरे आँगन की गौरैया’ एक बेटी के ऊँचा उड़ान भरने की, उसके सपनों और उसकी आकांक्षाओं की कहानी है जो अपनी माँ को भी समाज की सारी रूढ़ियों और बंधनों से मुक्त कराकर उसे भी नया आसमान देने की चाह रखती है।

चौथी कृति सीमा पर पहरा देते हमारे वीर सैनिकों में एक नया जोश, उत्साह और देशभक्ति जगाती ओज पूर्ण कविता ‘प्रयाण कर’ निश्चित रूप से पाठकों को भी देशभक्ति से सराबोर कर देगी।

और ‘जिजीविषा’ निराशा के क्षणों में आशा की ज्योति जलाती है ।निडर होकर जीवन के हर पल का उपभोग करने की सीख देती है ‘जिजीविषा’।

तथा ‘मैं मानव हूँ’ – मानव की असीम क्षमताओं को दर्शाती है। मनुष्य को जीवन की विषम परिस्थितियों से लड़ने को उद्यत करती है।

उम्मीद है ये सारी रचनाएँ पाठकों के दिलों में अपना स्थान बनाने में अवश्य सफल होंगी।

indiBooks : साहित्यिक सेवा के लिए आपको अब तक कितने सम्मान प्राप्त हुए हैं? क्या आप उनके बारे मे कोई जानकारी देना चाहेंगे?

Sudha Singh : साहित्यिक सेवा के लिए मुझे अब तक कई सम्मान मिल चुके हैं जिनमें कुछ उल्लेखनीय हैं –

  • विश्व हिंदी लेखिका मंच द्वारा ‘नारी शक्ति सागर सम्मान’
  • मधुशाला साहित्यिक परिवार की ओर से ‘मधुशाला काव्य गौरव’ का सम्मान
  • निज भाषा उत्कर्ष, दिल्ली द्वारा ‘निज भाषा गौरव सम्मान’
  • मॉम्सप्रेस्सो से हिन्दी लेखक सम्मान
  • साहित्य पीडिया द्वारा प्रशस्ति पत्र
  • स्टोरी मिरर द्वारा ‘लिटेररी कर्नल की उपाधि’
  • आई ब्लॉगर के तत्वावधान में आयोजित ‘ब्लॉगर ऑफ द ईयर – 2019’ टॉप 10 ब्लाॅगरों में द्वितीय स्थान
  • महाराष्ट्र कलम की सुगंध की ओर से ‘काव्य साधक सम्मान’ व अन्य कई।

indiBooks : क्या आपकी पूर्व में कोई पुस्तक प्रकाशित हुई है? यदि हाँ तो आपकी पहली पुस्तक के बारे में बताएं?

Sudha Singh : काव्य प्रभा से इतर अब तक गद्य और पद्य दोनों में मेरी कई साझा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें ‘सबरंग क्षितिज’ और ‘जयघोष’ उल्लेखनीय हैं। भविष्य में एकल पुस्तक के प्रकाशन की भी योजना है।

indiBooks : आप कब से लेखन कर रहें हैं और लेखन के अलावा आप क्या व्यवसाय करते है?

Sudha Singh : पेशे से मैं एक शिक्षिका हूँ अतः मेरे दिन का अधिकांश समय विद्यालय, शिक्षण संबंधी कार्यों और गतिविधियों में ही व्यतीत होता है। तत्पश्चात निजी कार्यों से कुछ समय निकाल कर मैं साहित्य सेवा करती हूँ। वस्तुतः लेखन कार्य मैं कई वर्षों से कर रही हूँ परंतु विगत 5 वर्षों से इस पर ज्यादा ध्यान दे रही हूँ।

indiBooks : आपकी पसंदीदा लेखन विधि क्या है, जिसमें आप सबसे अधिक लेखन करते हैं?

Sudha Singh : कविता और कहानी दोनों ही विधाएँ मुझे पसंद हैं। किंतु समय की न्यूनता के कारण कहानियों पर अधिक ध्यान नहीं दे पाती हूँ। अतः पद्य रचनाएँ अधिक करती हूँ।

indiBooks : हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के उत्थान पर आप कुछ कहना चाहेंगे?

Sudha Singh : अंग्रेजी भाषा के प्रति बढ़ते मोह और हिन्दी भाषा के प्रति लोगों की हीन दृष्टि हृदय को आहत करती है किन्तु जब किसी उभरते हुए हिन्दी लेखक को देखती हूँ तो अच्छा लगता है। मन में एक नई आशा का संचार होता है कि हिन्दी साहित्य की ओर लोग आकर्षित हो रहे हैं किन्तु कहीं न कहीं य़ह भी पाती हूँ कि अब जहाँ लेखकों की संख्या बढ़ रही है उसकी तुलना में पाठकों की कमी होती जा रही है। भावार्थ समझा जाए तो आजकल व्यक्ति अपनी भावनाओं को दूसरों तक पहुँचाना तो चाहता है किन्तु किसी अन्य की भावऩा और उसके परिप्रेक्ष्य को समझने से कतराता है। ऐसी स्थिति में मेरे मतानुसार साहित्य की सेवा पूर्ण रूपेण नहीं हो सकती। अतः साहित्य सेवा में जितना आवश्यक है लेखन; वाचन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वाचन से वर्तनी और वाक्य संरचना जैसे दोष भी शनैः शनैः दूर होने लगते हैं।अतः साहित्य के नवोत्थान के लिए नवांकुरों को अपना कुछ समय वाचन को भी देना चाहिए।

indiBooks : लेखन के अलावा आपके शौक या हॉबी?

Sudha Singh : प्रतिदिन कुछ नवीन सीखना और उसे बच्चों से या दूसरों से साझा करना अच्छा लगता है। अतः लेखन से इतर मेरा प्रथम शौक है शिक्षण- अधिगम। परंतु इसे मैं जुनून की संज्ञा दूँ तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। विद्या अर्जन व दान के लिए मैंने स्वयं को सभी बंधनों से मुक्त रखा है।

indiBooks : क्या वर्तमान या भविष्य में कोई किताब लिखने या प्रकाशित करने की योजना बना रहें हैं? यदि हां! तो अगली पुस्तक किस विषय पर आधारित होगी?

Sudha Singh : भविष्य में एकल किताब प्रकाशन की योजना तो है किन्तु अभी तक कोई विषय तय नहीं कर पाई हूँ।

indiBooks : अपने पाठकों और प्रशंसकों को क्या संदेश देना चाहते हैं?

Sudha Singh : अपने पाठकों से मात्र इतना ही कहना चाहूँगी कि आज सामाजिक संचार माध्यमों का हमारे निजी जीवन में दख़ल इतना बढ़ गया है कि हम एक दूसरे को बिल्कुल समय नहीं दे पाते और यही कारण है कि हमारा समाज भावनात्मक रूप से कमजोर होता जा रहा है आज अबालवृद्ध सभी इस आभासी दुनिया की जकड़ में आ चुके हैं। ऐसे समय में पुस्तकें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

पुस्तकें ही दोबारा हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति से जोड़ सकती हैं। अतः अब समय आ गया है कि इस आभासी दुनिया के जंजाल से निकला जाए और अपनी भावी पीढ़ी को भी सही दिशा दी जाए। उन्हें पुस्तकें पढ़ने को प्रेरित किया जाए ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें और एक बेहतर समाज का निर्माण हो सके।

indiBooks : आपके पाठकों को काव्य प्रभा क्यो पढ़नी चाहिए? इस बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

Sudha Singh : काव्य प्रभा लेखक के मनोभावों का व‍ह दर्पण है जो बड़ी सहजता से पाठक की भावनाओं से तारतम्य स्थापित करने में सक्षम है। अतः पाठकों से अनुरोध है कि वे काव्य प्रभा अवश्य पढ़ें।

About the ‘Kavya Prabha

साहित्य के सभी रसों से पगी ‘काव्य प्रभा’ एक मित्र की भाँति कभी आपको गुदगुदाएगी तो कभी आपके मन-मस्तिष्क को झकझोरती-सी प्रतीत होगी। इस पुस्तक में जहाँ एक ओर विशुद्ध हिंदी की रचनाएँ आपके मन में पैठ जमाती लक्षित होंगी, वहीं दूसरी ओर उर्दू के कुछ ख़याल भी अपना जादू बिखेरते नज़र आएँगे। काव्य प्रभा में स्थापित साहित्यकारों के साथ-साथ नवोदित रचनाकार भी आपको अपनी साहित्य सुरभि की मोहक बयार से सहलाएँगे। ‘काव्य प्रभा’ के सभी रचनाकार साहित्य रूपी सागर के उन अनमोल मोतियों की तरह है जिनकी तलाश हर साहित्य प्रेमी को होती है। उम्मीद है इन्हें पढ़कर साहित्य रसिकों की साहित्य पिपासा अवश्य ही शांत होगी।

prachi
Subscribe
Notify of
guest
2 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
विश्वमोहन

बहुत सुंदर साक्षात्कार। भविष्य की शुभकामनाएं@

Sudha singh vyaghr

बहुत-बहुत आभार आदरणीय 🙏 🙏